Friday, 9 October 2015

रविन्द्र जैन का निधन : संगीत के सुनहरे अध्याय का अंत

रविन्द्र जैन का निधन : संगीत के सुनहरे अध्याय का अंत 
                                                                                - अनिल वर्मा

                                 






                     









                    हिंदी फिल्मो के जाने माने संगीतकार और गीतकार रवींद्र जैन का आज ९ अक्टूबर २०१५ को शाम ४ बजे मुंबई  के लीलावती अस्‍पताल  में ७१ साल की उम्र में निधन हो गया है. वह लंबे समय से बीमार थे और पिछले कई दिनों से यूरिन इन्फेक्शन से जूझ रहे थे। इसके बाद उन्हें किडनी में दिक्कत हो गई थी। उनका लीलावती अस्पताल में आईसीयू में इलाज चल रहा था। बीते रविवार को वे नागपुर में थे, लेकिन बीमारी की वजह से वहां होने वाले कंसर्ट में हिस्सा नहीं ले पाए। नागपुर के वोकहार्ट हॉस्पिटल से चार्टर्ड प्लेन के जरिए उन्हें लीलावती अस्पताल लाया गया था।

                पिता पंडित इन्द्रमणि जैन तथा माता किरणदेवी जैन के घर  रवींद्र जैन का जन्म २८  फरवरी १९४४  को यूपी के अलीगढ़ में हुआ था। वे जन्म से ही देख नहीं पाते थे। उनके पिता पंडित इन्द्रमणि जैन संस्कृत के जाने-माने स्कॉलर और आयुर्वेदाचार्य थे। वे बचपन से इतने कुशाग्र बुद्धि के थे कि एक बार सुनी गई बात को कंठस्थ कर लेते, जो हमेशा उन्हें याद रहती। परिवार के धर्म, दर्शन और अध्यात्ममय माहौल में उनका बचपन बीता। वे प्रतिदिन मंदिर जाते और वहाँ एक भजन गाकर सुनाना उनकी दिनचर्या में शामिल था। रवीन्द्र भले ही दृष्टिहीन रहे हों, मगर उन्होंने बचपन में खूब शरारतें की हैं।

                                             रवीन्द्र अपने नाम के अनुरूप बंगाल के  रवीन्द्र-संगीत की ओर आकर्षित हुए। ताऊजी के बेटे पद्म भाई के कलकत्ता चलने के प्रस्ताव पर वह फौरन राजी हो गए। पिताजी से जेबखर्च के ७५  रुपए और माँ से  चावल-दाल की कपड़े की पोटली लेकर वह कलकत्ता पहुंच गए फिल्म निर्माता राधेश्याम झुनझुनवाला के जरिए रवीन्द्र को संगीत सिखाने की एक ट्‌यूशन मिली। जिसमे मेहनताने में चाय के साथ नमकीन समोसा मिला । पहली नौकरी बालिका विद्या भवन में 40 रुपए महीने पर लगी। इसी शहर में उनकी मुलाकात पं. जसराज तथा पं. मणिरत्नम्‌ से हुई। नई गायिका हेमलता से उनका परिचय हुआ। वे दोनों बांग्ला तथा अन्य भाषाओं में धुनों की रचना करने लगे। हेमलता से नजदीकियों के चलते उन्हें ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग कम्पनी से ऑफर मिलने लगे। एक पंजाबी फिल्म में हारमोनियम बजाने का मौका मिला। सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुति के १५१  रुपए तक मिलने लगे। फिर  संजीव कुमार के संपर्क में  आने के बाद कलकत्ता का यह पंछी उड़कर मुंबई आ गया।   

                       जब वह सन्‌ १९६८  में राधेश्याम झुनझुनवाला के साथ मुंबई आए ,तो पहली मुलाकात पार्श्वगायक मुकेश से हुई। रामरिख मनहर ने कुछ महफिलों में गाने के अवसर जुटाए। नासिक के पास देवलाली में फिल्म 'पारस' की शूटिंग चल रही थी।  संजीव कुमार ने वहाँ बुलाकार निर्माता एन. एन. सिप्पी से मिलवाया। रवीन्द्र ने अपने खजाने से कई अनमोल गीत तथा धुनें एक के बाद एक सुनाईं। श्रोताओं में शत्रुघ्न सिन्हा, फरीदा जलाल और नारी सिप्पी थे। अंततः उनका पहला फिल्मी गीत १४  जनवरी १९७२  को मोहम्मद रफी की आवाज में रिकॉर्ड हुआ। 

                            उन्होंने फिल्म सौदागर में उन्होंने मीठी यादगार धुनें बनाईं और स्वरबद्ध भी किया था ,जो लोकप्रिय हो गईं। फिर उन्होंने चोर मचाए शोर , गीत गाता चल , चितचोर  ,तपस्या ,  सलाखें , फकीरा ,दीवानगी और अंखियों के झरोखों में जैसी हिट फिल्मों का संगीत दिया था । एक महफिल में रवीन्द्र-हेमलता गा रहे थे, श्रोताओं में राज कपूर भी थे। उनका 'एक राधा एक मीरा दोनों ने श्याम को चाहा' गीत सुनकर राज कपूर झूम उठे, बोले- 'यह गीत किसी को दिया तो नहीं?'  रवीन्द्र जैन ने तुरंत कहा, 'राज कपूर को दे दिया है।' बस, यहीं राज कपूर के शिविर में उनका प्रवेश हो गया । 

                              टी. वी. सीरियल ‘रामायण’, ‘श्रीकृष्णा’, 'लव कुश', 'जय गंगा मैया', 'साईँ बाबा' और 'धरती का वीर योद्धा पृथ्वीराज चौहान' सहित कई पॉपुलर शोज में म्यूजिक और आवाज दी। उन्हें बड़ा ब्रेक राज कपूर ने १९८५  में फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' में दिया था। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेठ संगीतकार का फिल्‍मफेयर अवार्ड भी मिला था। इसके बाद ‘दो जासूस’ और ‘हिना’ के लिए भी उन्होंने म्यूजिक दिया। राजश्री प्रोडक्शन की 'नदिया के पार', 'विवाह' और 'एक विवाह ऐसा भी' जैसी कई सुपरहिट फिल्मों में भी उन्होंने म्यूजिक दिया था।
उ।
                            रवींद्र जैन को भारत सरकार की ओर से पद्मश्री पुरस्कार दिया गया था.मेरा यह सौभाग्य है गत अक्टूबर २०१४ को मुझे उनसे सागर में एक कार्यक्रम में मिलने का मौका मिला था , तब उनके मृदु व्यवहार और सरलता का मै कायल हो गया था

रविन्द्र जैन ने मन की आँखों से दुनियादारी को समझा। उन्होंने सरगम के सात सुरों के माध्यम से  जितना समाज से पाया, कई  गुना अधिक अपने श्रोताओं को लौटाया। वे मधुर धुनों के सर्जक होने के साथ गायक भी रहे और अधिकांश गीतों की आशु रचना भी उन्होंने कर सबको चौंकाया है। मन्ना डे के दृष्टिहीन चाचा कृष्णचन्द्र डे के बाद रवीन्द्र जैन दूसरे व्यक्ति हैं जिन्होंने दृश्य-श्रव्य माध्यम में केवल श्रव्य के सहारे ऐसा इतिहास रचा, जो युवा-पीढ़ी के लिए अनुकरणीय बन गया है। अपनी दुनिया, अपनी धुन में मगन रहने वाले रवींद्र ने एक बार कहा था कि वह संगीत के सुरों को अलग-अलग लोगों को करीब लाने का जरिया मानते हैं और अपने गीतों, अपनी रचनाओं से पीढ़ियों, सरहदों और जुबानों के फासले कम करना चाहते हैं।  रविंद्र जैन को भारतीय सिनेमा जगत में सबसे खूबसूरत, कर्णप्रिय और भावपूर्ण गीतों के लिए उन्हें सदैव जाना जाता रहेगा। 

        रविन्द्र जैन केकई लोकप्रिय आज भी लोग गुनगुनाते है , उनमे से चंद इस प्रकार है ……
    १-आज से पहले, आज से ज्यादा , २- अखियों के झरोखों से मैने देखा जो सावरे , ३-घुंगरु की तरह, बजता ही रहा हूँ मै , ४-गोरी तेरा गाँव बडा प्यारा, मैं तो गया मारा , ५- गूँचे लगे हैं कहने, फूलों से भी सुना हैं तराना प्यार का ,६- हर हसीन चीज का मैं लतबगार हूँ ,  ७-जब दीप जले आना, जब शाम ढ़ले आना ,८-तेरा मेरा साथ रहे ,९-तू जो मेरे सूर में, सूर मिला ले, संग गा ले , १०- गीत गाता चल, ओ साथी गुनगुनाता चल,११- श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम , १२- सजना है मुझे सजना के लिए , १३-ले तो आए हो हमें सपनों के गाँव में, १४-एक राधा एक मीरा, १५ - घुंघरू की तरह , १६- हुस्न पहाड़ों का।,१७- मैं हूं खुशरंग हिना , १८- कौन दिशा में लेके।

                                                                     - अनिल वर्मा  


Monday, 23 February 2015

फ़िल्मी माँ निरुपा रॉय





                          वह सचमुच माँ ही थी : निरुपा रॉय
                                                                                                                 - अनिल वर्मा 

                      






                                                                  फिल्मों की मायावी दुनिया इतनी अदभूद है कि फिल्मों के नायक वास्तविक जीवन के महानायकों से भी विराट लगते  है और अनेक श्रेष्ठ  कलाकार तो अपने किरदारों में डूबकर अपने निज वजूद को भी आमूल मिटा देते है और उनकी फ़िल्मी छवि हमारे मानसपटल पर चिरस्थायी अंकित हो जाती है। ऐसी ही एक नायब फिल्म अभिनेत्री थी ,निरुपा रॉय जी , जिन्होंने करीब ३ दशक तक लगातार ऐसी बदनसीब माँ का रोल अदा किया ,जिस पर ज़माने भर कहर टूटता है और वो अक्सर अपने  बच्चो को खोकर सबकी सहानुभूति का पात्र बन जाती थी।  उनकी हर फिल्म में ऐसे भावुक टाइप्ड रोल से मुझे उनसे इतनी ज्यादा चिढ़ हो गयी थी कि फिल्म में उनके आते ही मैं बौखला जाता था कि अब ये टसुयेबहाउ फिर अपने बच्चे को खो देगी और पूरी फिल्म में टेंशन देती रहेगी . पर मेरे मानस पर वर्षो से अंकित निरुपा जी की यह नकारात्मक छवि उनसे प्रत्यछ मिलते ही पल भर में खंडित हो गयी और उनके ममतामयी व्यक्तित्व के सामने में स्वमेव ही नतमस्तक हो गया।


                                निरुपा  रॉय जी भारतीय सिने जगत की वह महान शख्सियत  है ,जो किसी परिचय की मोहताज़ नहीं है। उन्होंने महज़ १५ वर्ष की आयु में सन १९४६ में अपनी फ़िल्मी जीवन की शुरुवात की थी और ५३ वर्षो तक लगातार नायिका , सहनायिका और चरित्र अभिनेत्री के विविधतापूर्ण किरदारो को जीवंतता प्रदान करते हुए २८८ फिल्मों में काम किया था। उन्हें ३ बार फिल्मफेयर अवार्ड और १ बार लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड भी मिला था।

                            सन २००४ में राखी के पर्व पर जब मेरी बहिन अनीता अपने बेटे जय के पास मुंबई गयी थी ,तो मै भी मुंबई चला गया था और सदैव की भांति पसंदीदा  फ़िल्मी सितारों से मिलने के लिए प्रयासरत था। ३० अगस्त को मैं कोलाबा में अपनी फेवरेट हेलेन जी  का घर खोजते हुए संयोगवश नेपियन सी रोड की एम्बेसी बिल्डिंग तक पंहुच गया था ,जहाँ   ग्राउंड फ्लोर पर स्थित फ्लैट न. १ में निरुपा रॉय रहती थी । सबसे पहले उनके पुत्र कृष्ण मिले ,उन्हें अपना परिचय देते हुए निरुपा जी के बारे में पूछा ,तो वो तुरंत  उन्हें बुला लाये। मैं  फ़िल्मी दुनिया की उस माँ को एकटक देखते रह गया , वो मुझसे कोई पूर्व परिचय ना  होने पर भी सम्मानपूर्वक अपने घर के भीतर ले गयी , उस समय वो मैक्सी या गाउन पहनी थी , यद्दपि उनके चेहरे पर लम्बी बीमारी के वजह से काफी सूजन और मलिनता  थी , फिर भी वो इतने उत्साह और स्नेह से मिली कि पल भर में उनके प्रति मेरी धारणा बदल गयी । वो बहुत सी फिल्मो में अभिताभ बच्चन की माँ बनी थी और  अमिताभ  जी उन्हें माँ के समान सम्मान देते थे। वास्तव में उस दिन उनके ममतापूर्ण मधुर व्यवहार से मुझे यूँ अहसास हुआ कि वो सचमुच पूरे देश की माँ है ।

                                                                         मैं उनके पुराने पैटर्न के ड्राइंगरूम में सोफे पर बैठा था। वहां दीवारो पर अनेक पुराने महानायकों के साथ उनके फोटो लगे थे। उनसे फिल्म ,अभिनय ,रोल आदि के बारे में अनेक बाते हुई। उन्होंने मुझे अपने पति से भी मिलवाया ,जो काफी मृदुभाषी थे।उस समय मुझे उनकी एक फिल्म 'दीवार'  का अभिताभ जी और शशि कपूर की वो चर्चित डॉयलॉगबाज़ी  याद आ गयी  कि 'आँय तुम्हारे पास क्या है ,मेरे पास बैंक बैलेंस , गाड़ी ,बंगला है ,मेरे पास माँ है ',  यही तो वही माँ थी। मैंने जब कैमरे से उनका फोटो खींचना चाहा , तो उन्होंने मृदुलता से बीमारी के कारण चेहरा बिगड़ जाने  के कारण इसके लिए मना करते हुए माफ़ी चाही और यह बोली कि मैं अपनी एक फोटो आपको देती हूँ। फिर उन्होंने मुझे अपना एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो अपने ऑटोग्राफ के साथ' विथ लव ' लिखकर दिया था ।  वह फोटो आज भी मेरे अल्बम में एक अमूल्य निधि के रूप में रखी हुई है।

                                                     जब मैंने उनसे विदा लेते हुए आदरभाव से उनके चरणस्पर्श किये ,तो उन्होंने मेरे सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए आशीर्वाद दिया था . इस यादगार मुलाकात के चंद दिनों बाद ही १३ अक्टूबर २००४ को निरुपा रॉय जी का निधन हो गया। जाने वाले चले जाते है और पीछे बाकी रह जाती है ,उनकी अमिट यादें। आज भी जब फ़िल्मी  परदे पर निरुपा जी को देखता हूँ ,तो बरबस ही श्रद्वा और सम्मान से इस ममतामयी माँ के लिए मेरा सिर झुक जाता है और मन बहुत भावुक हो जाता है जब उनके साथ अपनी वास्तविक माँ को खो देने के जख्म टीसने लगते  है।

                                                                                                                          - अनिल वर्मा

Sunday, 15 February 2015

                   
                     फिल्म ''शाह -ए - मिश्र '' १९४६
                                                                                                                             -अनिल वर्मा 


                     सन  १९४५-४६ तक फिल्मो में संघर्ष के कठिन दिनों में अजीत की मुलाकात एक व्यक्त्ति गोविंदराम सेठी से हुई ,जो मूक फिल्मो के दौर से भारतीय सिनेमा से जुड़े हुए थे।,उसने अजीत से वायदा किया कि  जब भी उसे  मौका मिलेगा वह उन्हें हीरो बनाएगा।  एक सुबह सेठी ने उन्हें बुलाकर साथ चलने को कहा , तब अजीत को यह पता लगा कि विष्णु सिनेटोन जो केवल धार्मिक फिल्मे बनाती थी वह एक स्टंट फिल्म बनाने जा रही है, इस तरह अजीत को हीरो के रूप में अपनी पहली फिल्म "शाह-ए -मिश्र '' मिल गयी ,इसमें सहायक निर्देशक केदार शर्मा  थे , जिनसे अजीत की अच्छी दोस्ती हो गयी थी।यह फिल्म १९४६ में आई थी , इसमें उनकी नायिका गीता बोस थी . इस समय तक अजीत अपना मूल नाम हामिद खान ही फिल्मों में भी उपयोग करते थे। किस्मत प्रोडक्शन की इस फिल्म को अनुभवी निर्देशक जी. आर. सेठी ने निर्देशित किया था ,  हालांकि  यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही , पर आकर्षक और सजीले व्यक्तित्व के दम पर अजीत फिल्मकारों को अपनी और आकृष्ट करने में सफल रहे ।

           इस फिल्म में गीत रूपबानी के थे और संगीत निर्देशन शांति कुमार देसाई का था। फिल्म में निम्नलिखित गीत थे -
१-फूलो को छेड़कर .... २-खामोश रहे ए  हुस्न तेरे बन्दे ....३-दिल बेचता हूँ सरकार ....४- गा  रही है जिंदगी ...
५- जमीन तेरी फलक तेरा ....६-ए रहमत  बारी ....७-दुनिया की जन्नत....८- इंक़लाब जिंदाबाद ....

Saturday, 14 February 2015

         
      अजीत फिल्म '' आन बान  '' (१९५६) में 
                                                          
                                                                                                                         - अनिल वर्मा

    
 




                                                                                                                      

                     सन १९५६ में निर्देशक डी.डी. कश्यप के निर्देशन में कश्यप प्रोडक्शन की फिल्म '' आन बान '' एक प्रेम त्रिकोण पर आधारित सामाजिक फिल्म थी. इसमें हीरो अजीत साहेब थे ,उनकी हीरोइन नलिनी जयवंत थी , यह उल्लेखनीय है कि उस दौर में अजीत और नलिनी जयवंत की लोकप्रिय जोड़ी ने १५ फिल्मों में एक साथ काम किया था।  उनके अलावा  फिल्म में प्राण , महिपाल ,  उषा किरण , उल्लास ,मनमोहन कृष्ण , निरंजन शर्मा ,प्रतिभा देवी ,माया देवी  की महत्वपूर्ण भूमिकाये थी।

                  इस फिल्म को प्रख्यात संगीतकार हुस्नलाल भगतराम ,गीतकार क़मर जलालाबादी और मोह. रफ़ी की प्रतिभाशाली तिकड़ी के नायब गीतों  के लिए याद किया जाता है. फिल्म का उनका यह गीत '' भगवान तुम्हारी दुनिया में क्यों दिल ठुकराते जाते है '' काफी लोकप्रिय हुआ था . इसके अलावा फिल्म में मोह. रफ़ी के अलावा आशा भोसले ,लता मंगेशवर ,मुबारक बेगम के गाये यह गीत थे --१-ओ आसमानवाले आसमानवाले जाने नहीं देते …, २-पी पी की बोल बोल पपीहे , ३-मुरली मनोहर देवकी नंदन…, ४-तूने कैसी आग लगाई …५-,झूम रही है जिंदगी …,६-मेरे दिल में तुम छिपे हो …,७ अजी इस फानी दुनिया में …,भी कर्णप्रिय गीत थे।

फिल्म ''नीली आँखें ''


    अजीत फिल्म ''नीली आँखें ''(१९६२) में

                                                        -अनिल वर्मा 
 
       

                    



                                           फिल्म '' नीली आखें '' सोसाइटी पिक्चर्स के बैनर तले  बनी थी. सन १९६२ में रिलीज़ इस फिल्म के निर्देशक वेद मारन और प्रोड्यूसर अब्दुल रहीम थे। अजीत की यह  एकलौती फिल्म है ,जिसमे  उनका डबल रोल नज़र आता है । उस दौर की निहायत खूबसूरत अदाकारा  शकीला उनकी  नायिका थी . उनके साथ फिल्म में हेलेन , राज मेहरा , तिवारी ,शेट्टी, जॉनी वॉकर , टुनटुन के भी अहम किरदार थे। निसंदेह यह एक दोयम दर्जे की फिल्म थी ,जिसकी कहानी बेहद  कमजोर थी ,निर्देशन भी औसत दर्जे का था , कलाकारों का अभिनय काफी साधारण था और इस मिस्ट्री का अंत इतना सोचा समझा था की हर दर्शक इंटरवल में ही फिल्म का अंत भाँप चुका था , नजीजा वही ढाक के तीन पात, फिल्म  फ्लॉप रही।

                                  फिर भी फिल्म का गीत -संगीत काफी उत्कृष्ट स्तर का था। अमर गायक मुकेश , मोह. रफ़ी , मन्ना डे ,सुमन कल्यानपुर ,गीता दत्त के गाये मधुर सुरीले गीतो ने फिल्म को जीवंत बनाये रखा था। गीतकार गुलशन बाबरा के गीतों को संगीत निर्देशक दाताराम वाडकर ने बखूबी सजाया सवांरा था।  फिल्म  में प्रमुख गीत इस प्रकार थे -(१ )ये नशीली हवा छा रहा नशा.…(२) नज़र का झुक जाना .…,(३) पंछी अब तू है जाल में धोका है तेरी चाल में .…(४ ) देखिये न इस तरह झूम के .…(५ ) ए  मेरी जाने वफ़ा .… (६ )  नज़रों का ऐसा कांटा ।


           फिल्म की कहानी कुछ इस प्रकार थी। लखपति सेठ  रायबहादुर (तिवारी) की इकलौती बेटी शीला (शकीला )एक गरीब कवि (अजीत प्रथम रोल)  से मोहब्बत करती है , लालची सेठ कही से हीरे हड़पने के चक्कर में है , एक अपराधी गैंग भी इसी फ़िराक में है।  कहानी आगे बढ़ती है ,जब शीला यह देखकर दंग रह जाती है कि उसका पिता अपने मरहूम दोस्त के जिस बेटे दिलीप (अजीत दूसरा रोल) को लंदन से लाता है, जो प्रेमी कवि का हमशक्ल है।  एक ज्योतिषी प्रेम यह भविष्वाणी करता है कि सेठ किसी घोर संकट में फँसने वाला है और दिलीप किसी का खून करेगा। परेशान शीला दिलीप पर नज़र रखने पंजवानी (जॉनी वाकर ) को कहती है , अचानक दिलीप कही गायब हो जाता है , फिर भारी मारधाड़ , खून खराबा और भागमभाग होती है ,हीरे भी चोरी हो जाते है।  आखिर यह पर्दाफाश हो जाता है कि दिलीप और कवि दोनों एक ही व्यक्ति अजीत है ,जो सी. आय. डी. ऑफिसर  है , प्रेम खूनी  है और सेठजी , प्रेम और उनका पार्टनर सब हीरे लूटना चाहते थे। हमेशा की तरह हीरो हीरोइन की शादी  के साथ फिल्म का सुखद अंत हो जाता है।
                                                                                                                              -अनिल वर्मा
                     

Thursday, 12 February 2015

अजीत फिल्म चंदा की चांदनी (१९४८) में
                                                                                 -अनिल वर्मा
                                                                            
                       अजीत साहब ने सन १९४५ से १९९५ तक करीब ५० वर्ष तक भारतीय सिने जगत में अपनी बेहतरीन अदाकारी का जादू बिखेरा है , इतने लम्बे अरसे बाद आज उनकी पुरानी फिल्मों के बारे में जानकारी एकत्र करना भूसे के ढेर से सुई खोजने की भाँति दुरूह कार्य है , फिर भी इतिहास की इस  धरोहर का वज़ूद बचाये रखने के अहम दायित्व के निर्वाह के लिए इसका संकलन आवश्यक है।

                अजीत के शुरुवाती दौर की फिल्म '' चन्दा की चाँदनी ''जेमनी कम्बाइन्स प्रोडक्शन की ब्लैक एण्ड व्हाइट फिल्म थी , जिसे एस.एस. वासन ने निर्देशित किया था।  ६ जनवरी १९४८ को रिलीज़ यह फिल्म स्वाधीन भारत की प्रारंभिक युग  की फिल्म थी , पर ऐसा भी नहीं कि देश के बंटवारे की त्राषदी के विषम परिस्थितियों के उस दौर  में बहुत कम फिल्मे बनी हो , सन १९४८ में ही करीब १३५ हिंदी फ़िल्में रिलीज़ हुई थी , जिनमे राजकपूर की आग,अमरप्रेम , दिलीप कुमार की शहीद ,घर की इज्जत ,नदिया के पार , देवांनद की ज़िद्दी ,विद्या आदि प्रमुख फिल्म भी शामिल थी।

                       इस फिल्म में अजीत नायक थे और उनकी नायिका मोनिका देसाई थी , इसके अलावा फिल्म में रामायण तिवारी , जयराज, रचना, ई. बिल्मोर , केसरी एवं अमीर बानो की भी अहम भूमिका थी। जाने माने गीतकार दीना नाथ मधोक द्वारा फिल्म के मधुर गीतो के बोल लिखे गए थे , जो उस वक़त की बेहद कामयाब संगीतमयी फिल्म रतन (१९४४) में अपनी प्रतिभा साबित कर चुके थे , दिलकश संगीत ज्ञानदत्त का था और अधिकांश गीतों को गीता रॉय (दत्त) ने आवाज़ दी थी ,उनका एक गीत हैं " उल्फत के दर्द का भी मज़ा लो". १८ साल की जवान गीता रॉय की सुमधुर आवाज़ में यह गाना सुनते ही बनता है. प्यार के दर्द के बारे में वह कहती हैं "यह दर्द सुहाना इस दर्द को पालो, दिल चाहे और हो जरा और हो ".
                       

इसके अलावा फिल्म के अन्य गीत   चंदा की चांदनी की मौज़ है … , काली काली रात है..... , हमको भुला दिया.... , जब काली काली रात होगी दिल से दिल .... , पिया पिया बागो में पपीहा बोले … भी बहुत उम्दा गीत है .
                                                                                                                   - अनिल वर्मा 














                                            
                           निर्देशक के. अमरनाथ के होम प्रोडक्शन की सामाजिक ड्रामा की फिल्म '' बारात '' सन १९६० में रिलीज़ हुई थी।  इसमें हीरो अजीत ,हीरोइन शकीला के लावा मुकरी ,प्रतिमा देवी ,सज्जन ,मुराद और सलीम खान थे।  जी हाँ , हमारे मशहूर सलीम जावेद की जोड़ी वाले संवाद लेखक और सलमान खान के पिता सलीम खान।  बहुत कम लोग जानते होंगे कि सलीम खान फिल्मों में बतौर एक्टर काम करने के लिये मुंबई आये थे और उन्होंने इसी फिल्म ‘बरात’ मेंअभिनय कर के अपने फ़िल्मी जीवन की शुरुआत की थी। 

                  इस फिल्म में अजीत और शकीला की बेहतरीन अदाकारी के अलावा मुकेश, मोह. रफ़ी , मन्ना डे ,लता मंगेशवर और गीता दत्त के सुरीले कर्णप्रिय गीत यादगार थे , मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों में  चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में इन महान गायको ने जादू फूँक दिया था।  आपने मुकेश का यह लोकप्रिय गीत 'मुफ्त में हुए बदनाम किसी से हाय दिल को लगा के ' जरूर सुना होगा।  इसके अलावा गीत 'चलो अब कहना मान भी जाओ ' , 'अरे जाने वाले हमारी गली आना ' , 'आपने कभी न कभी सुने जरूर होगे। एक बार यू ट्यूब पर इस पुरानी लोकप्रिय फिल्म को जरूर देखे

Wednesday, 11 February 2015

                                फिल्म '' मेहंदी '' (१९५८) 
                                                           -अनिल वर्मा 

                             अजीत और जयश्री गडकर द्वारा अभिनीत फिल्म '' मेहँदी '' १५ सितम्बर १९५८ को रिलीज़ हुई थी। वास्तव में फिल्म इतिहास में अब तक मेहंदी नाम की कुल फिल्म्स बनायीं जा चुकी है ,  जो कि सन १९४७, १९५८ , १९८३ एवं १९९८ में रिलीज़ हुई है। १९५८ की पुष्पा पिक्चर्स की इस फिल्म के प्रोडयूसर ए.ए. नाडियाडवाला और निर्देशक एस. एम. युसूफ थे। अन्य प्रमुख कलाकार ललिता पवाँर ,मुजफ्फर अदीब ,एम कुमार,वीना और बालम थे। फिल्म में संगीत रवि का था और  यह हेमंत कुमार , मोह. रफ़ी एवं लता मंगेश्वर जी दिलकश गीतों और कव्वाली ,मुजरा से परिपूर्ण संगीतमय फिल्म  थी। इस फिल्म का प्रख्यात गीत ' बेदर्द जमाना तेरा दुश्मन है तो क्या है दुनिया में नहीं जिसका कोई उसका खुदा है ' आज भी लोग गुनगुनाते है



Thursday, 29 January 2015


            हॉकी के गौरव जशवंत सिंह राजपूत: अब यादें ही शेष 

                                                                                                                   - अनिल वर्मा 
                                                                                                       
            '  वह भारत को गौरवान्वित करने वाली जमात के सितारे थे '.भू. पू. भारतीय कप्तान गुरुबक्स सिंह द्वारा जशवंत सिंह राजपूत के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित बाबत व्यक्त उद्गार बखूबी उनकी यशगाथा को बयां करते थे। देश को लगातार २ ओलम्पिक में स्वर्णपदक जीतने का गौरव दिलाने वाले हॉकी ओलम्पियन जशवंत सिंह का गत २८-१-२०१५ को कोलकोता के सिटी हॉस्पिटल में निधन हो गया।  भारत पर २०० वर्ष तक राज्य करने वाले अंग्रेजो को स्वाधीनता प्राप्ति के चंद दिनों उपरांत ही  उनकी राजधानी में सन १९४८ लंदन ओलम्पिक में धूल चटाकर तिरंगा फहराने वाली ऐतिहासिक भारतीय टीम में जशवन्तसिंह भी शामिल थे।

                                         जशवंत सिंह का जन्म १९२६ को दिल्ली में हुआ था।  स्कूल में पढ़ने के दौरान ही उनकी हॉकी प्रतिभा में निखार आना आरंभ हो गया था , फिर उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लिए उत्कृष्ट खेल से राष्ट्रीय चयनकर्ताओं को अपनी ओर आकृष्ट किया और उन्हें तत्काल ही लंदन ओलिंपिक के लिए भारतीय टीम में लेफ्ट हाफ की पोजीशन पर ले लिया गया ,भारतीय टीम अपने शानदार खेल से
ओलिंपिक के फाइनल में पहुंची , तब अंतिम मुकाबले में भारत ने ब्रिटेन को ४-० से अंतर से हराकर उसके दम्भ को चूर चूर कर दिया था. जशवंत सिंह वेम्बले स्टेडियम लंदन में तिरंगे फहराने के उन स्वर्णिम पल को आजीवन गर्व के साथ याद करते रहे .वह कहते थे हमारा झंडा उनकी धरती पर था, इससे ज्यादा ओर हम क्या चाह सकते थे।  

                                                        जशवंत पहले लेफ्ट हाफ खेलते थे , फिर वह सेंटर हाफ की पोजीशन पर खेलने लगे,उन्हें ड्रिब्लिंग के कौशल और गेंद पर नियंत्रण में महारथ हासिल थी। लंदन ओलिंपिक से लौटने के बाद वह कोलकोता जाकर भवानीपुर क्लब के लिए खेलने लगे , सन १९५२ में वह मोहन बागान में चले गए और F.A . कप में खिताबी जीत के सूत्रकार बने।  इसके बाद उन्होंने हेलसिंकी ओलम्पिक खेलों में भी देश का प्रतिनिधित्व कर   पुनः स्वर्णपदक जीतने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हेलसिंकी से वापस लौटने के बाद उन्होंने हॉकी से सन्यास  ले लिया ,इसका कारण  यह था कि उन्होंने कोलकोता में देश का सबसे बड़ा सर्विस स्टेशन आरंभ किया था ,उन्हें लगा कि लोग यह न कहे कि वह हॉकी को १००% नहीं दे रहे है ,इसलिए उन्होंने अपने पहले प्यार हॉकी को छोड़ दिया ,उनका दूसरा प्यार उनका प्यारा शहर कोलकोता था , जिसे उन्होंने पत्नी के निधन के बाद अकेला रहने पर भी नहीं छोड़ा था और बेटी के कहने पर भी उसके साथ कनाडा नहीं गए।

                                                   हॉकी ओलम्पियन  लेज़ली क्लाडियस उनके सबसे घनिष्ठ मित्र थे ,वह प्रतिदिन सुबह के समय अपने मित्रो के साथ घूमना पसंद करते थे। वह कहते थे कि उनके समय में हॉकी खेलना सम्मान और गौरव की बात थी ,पर अब हॉकी का पतन हो गया है , वह भारतीय हॉकी से बेहद हताश थे और कभी भी भारत के मैच  नहीं देखते थे।  उनके अंतिम पसंदीदा खिलाडी धनराज पिल्लै थे ,वह पूर्व खिलाड़ियों को हॉकी का प्रशासन सौपा जाने की राय देते थे। अंतिम दिनों मेंअपनी भांजी के साथ वह पार्क स्ट्रीट कोलकोता के निकट बोर्डफोर्ड लेन में रह रहे थे। उनकी मृत्यु के साथ भारतीय हॉकी के एक और सुनहरे युग का अंत हो गया है।  
                                                                                                                     -  अनिल वर्मा