Thursday, 12 February 2015

अजीत फिल्म चंदा की चांदनी (१९४८) में
                                                                                 -अनिल वर्मा
                                                                            
                       अजीत साहब ने सन १९४५ से १९९५ तक करीब ५० वर्ष तक भारतीय सिने जगत में अपनी बेहतरीन अदाकारी का जादू बिखेरा है , इतने लम्बे अरसे बाद आज उनकी पुरानी फिल्मों के बारे में जानकारी एकत्र करना भूसे के ढेर से सुई खोजने की भाँति दुरूह कार्य है , फिर भी इतिहास की इस  धरोहर का वज़ूद बचाये रखने के अहम दायित्व के निर्वाह के लिए इसका संकलन आवश्यक है।

                अजीत के शुरुवाती दौर की फिल्म '' चन्दा की चाँदनी ''जेमनी कम्बाइन्स प्रोडक्शन की ब्लैक एण्ड व्हाइट फिल्म थी , जिसे एस.एस. वासन ने निर्देशित किया था।  ६ जनवरी १९४८ को रिलीज़ यह फिल्म स्वाधीन भारत की प्रारंभिक युग  की फिल्म थी , पर ऐसा भी नहीं कि देश के बंटवारे की त्राषदी के विषम परिस्थितियों के उस दौर  में बहुत कम फिल्मे बनी हो , सन १९४८ में ही करीब १३५ हिंदी फ़िल्में रिलीज़ हुई थी , जिनमे राजकपूर की आग,अमरप्रेम , दिलीप कुमार की शहीद ,घर की इज्जत ,नदिया के पार , देवांनद की ज़िद्दी ,विद्या आदि प्रमुख फिल्म भी शामिल थी।

                       इस फिल्म में अजीत नायक थे और उनकी नायिका मोनिका देसाई थी , इसके अलावा फिल्म में रामायण तिवारी , जयराज, रचना, ई. बिल्मोर , केसरी एवं अमीर बानो की भी अहम भूमिका थी। जाने माने गीतकार दीना नाथ मधोक द्वारा फिल्म के मधुर गीतो के बोल लिखे गए थे , जो उस वक़त की बेहद कामयाब संगीतमयी फिल्म रतन (१९४४) में अपनी प्रतिभा साबित कर चुके थे , दिलकश संगीत ज्ञानदत्त का था और अधिकांश गीतों को गीता रॉय (दत्त) ने आवाज़ दी थी ,उनका एक गीत हैं " उल्फत के दर्द का भी मज़ा लो". १८ साल की जवान गीता रॉय की सुमधुर आवाज़ में यह गाना सुनते ही बनता है. प्यार के दर्द के बारे में वह कहती हैं "यह दर्द सुहाना इस दर्द को पालो, दिल चाहे और हो जरा और हो ".
                       

इसके अलावा फिल्म के अन्य गीत   चंदा की चांदनी की मौज़ है … , काली काली रात है..... , हमको भुला दिया.... , जब काली काली रात होगी दिल से दिल .... , पिया पिया बागो में पपीहा बोले … भी बहुत उम्दा गीत है .

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