हॉकी के गौरव जशवंत सिंह राजपूत: अब यादें ही शेष
- अनिल वर्मा
' वह भारत को गौरवान्वित करने वाली जमात के सितारे थे '.भू. पू. भारतीय कप्तान गुरुबक्स सिंह द्वारा जशवंत सिंह राजपूत के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित बाबत व्यक्त उद्गार बखूबी उनकी यशगाथा को बयां करते थे। देश को लगातार २ ओलम्पिक में स्वर्णपदक जीतने का गौरव दिलाने वाले हॉकी ओलम्पियन जशवंत सिंह का गत २८-१-२०१५ को कोलकोता के सिटी हॉस्पिटल में निधन हो गया। भारत पर २०० वर्ष तक राज्य करने वाले अंग्रेजो को स्वाधीनता प्राप्ति के चंद दिनों उपरांत ही उनकी राजधानी में सन १९४८ लंदन ओलम्पिक में धूल चटाकर तिरंगा फहराने वाली ऐतिहासिक भारतीय टीम में जशवन्तसिंह भी शामिल थे।
जशवंत सिंह का जन्म १९२६ को दिल्ली में हुआ था। स्कूल में पढ़ने के दौरान ही उनकी हॉकी प्रतिभा में निखार आना आरंभ हो गया था , फिर उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लिए उत्कृष्ट खेल से राष्ट्रीय चयनकर्ताओं को अपनी ओर आकृष्ट किया और उन्हें तत्काल ही लंदन ओलिंपिक के लिए भारतीय टीम में लेफ्ट हाफ की पोजीशन पर ले लिया गया ,भारतीय टीम अपने शानदार खेल से ओलिंपिक के फाइनल में पहुंची , तब अंतिम मुकाबले में भारत ने ब्रिटेन को ४-० से अंतर से हराकर उसके दम्भ को चूर चूर कर दिया था. जशवंत सिंह वेम्बले स्टेडियम लंदन में तिरंगे फहराने के उन स्वर्णिम पल को आजीवन गर्व के साथ याद करते रहे .वह कहते थे हमारा झंडा उनकी धरती पर था, इससे ज्यादा ओर हम क्या चाह सकते थे।
जशवंत पहले लेफ्ट हाफ खेलते थे , फिर वह सेंटर हाफ की पोजीशन पर खेलने लगे,उन्हें ड्रिब्लिंग के कौशल और गेंद पर नियंत्रण में महारथ हासिल थी। लंदन ओलिंपिक से लौटने के बाद वह कोलकोता जाकर भवानीपुर क्लब के लिए खेलने लगे , सन १९५२ में वह मोहन बागान में चले गए और F.A . कप में खिताबी जीत के सूत्रकार बने। इसके बाद उन्होंने हेलसिंकी ओलम्पिक खेलों में भी देश का प्रतिनिधित्व कर पुनः स्वर्णपदक जीतने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हेलसिंकी से वापस लौटने के बाद उन्होंने हॉकी से सन्यास ले लिया ,इसका कारण यह था कि उन्होंने कोलकोता में देश का सबसे बड़ा सर्विस स्टेशन आरंभ किया था ,उन्हें लगा कि लोग यह न कहे कि वह हॉकी को १००% नहीं दे रहे है ,इसलिए उन्होंने अपने पहले प्यार हॉकी को छोड़ दिया ,उनका दूसरा प्यार उनका प्यारा शहर कोलकोता था , जिसे उन्होंने पत्नी के निधन के बाद अकेला रहने पर भी नहीं छोड़ा था और बेटी के कहने पर भी उसके साथ कनाडा नहीं गए।
हॉकी ओलम्पियन लेज़ली क्लाडियस उनके सबसे घनिष्ठ मित्र थे ,वह प्रतिदिन सुबह के समय अपने मित्रो के साथ घूमना पसंद करते थे। वह कहते थे कि उनके समय में हॉकी खेलना सम्मान और गौरव की बात थी ,पर अब हॉकी का पतन हो गया है , वह भारतीय हॉकी से बेहद हताश थे और कभी भी भारत के मैच नहीं देखते थे। उनके अंतिम पसंदीदा खिलाडी धनराज पिल्लै थे ,वह पूर्व खिलाड़ियों को हॉकी का प्रशासन सौपा जाने की राय देते थे। अंतिम दिनों मेंअपनी भांजी के साथ वह पार्क स्ट्रीट कोलकोता के निकट बोर्डफोर्ड लेन में रह रहे थे। उनकी मृत्यु के साथ भारतीय हॉकी के एक और सुनहरे युग का अंत हो गया है।
- अनिल वर्मा

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