- अनिल वर्मा
फिल्मों की मायावी दुनिया इतनी अदभूद है कि फिल्मों के नायक वास्तविक जीवन के महानायकों से भी विराट लगते है और अनेक श्रेष्ठ कलाकार तो अपने किरदारों में डूबकर अपने निज वजूद को भी आमूल मिटा देते है और उनकी फ़िल्मी छवि हमारे मानसपटल पर चिरस्थायी अंकित हो जाती है। ऐसी ही एक नायब फिल्म अभिनेत्री थी ,निरुपा रॉय जी , जिन्होंने करीब ३ दशक तक लगातार ऐसी बदनसीब माँ का रोल अदा किया ,जिस पर ज़माने भर कहर टूटता है और वो अक्सर अपने बच्चो को खोकर सबकी सहानुभूति का पात्र बन जाती थी। उनकी हर फिल्म में ऐसे भावुक टाइप्ड रोल से मुझे उनसे इतनी ज्यादा चिढ़ हो गयी थी कि फिल्म में उनके आते ही मैं बौखला जाता था कि अब ये टसुयेबहाउ फिर अपने बच्चे को खो देगी और पूरी फिल्म में टेंशन देती रहेगी . पर मेरे मानस पर वर्षो से अंकित निरुपा जी की यह नकारात्मक छवि उनसे प्रत्यछ मिलते ही पल भर में खंडित हो गयी और उनके ममतामयी व्यक्तित्व के सामने में स्वमेव ही नतमस्तक हो गया।
निरुपा रॉय जी भारतीय सिने जगत की वह महान शख्सियत है ,जो किसी परिचय की मोहताज़ नहीं है। उन्होंने महज़ १५ वर्ष की आयु में सन १९४६ में अपनी फ़िल्मी जीवन की शुरुवात की थी और ५३ वर्षो तक लगातार नायिका , सहनायिका और चरित्र अभिनेत्री के विविधतापूर्ण किरदारो को जीवंतता प्रदान करते हुए २८८ फिल्मों में काम किया था। उन्हें ३ बार फिल्मफेयर अवार्ड और १ बार लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड भी मिला था।
सन २००४ में राखी के पर्व पर जब मेरी बहिन अनीता अपने बेटे जय के पास मुंबई गयी थी ,तो मै भी मुंबई चला गया था और सदैव की भांति पसंदीदा फ़िल्मी सितारों से मिलने के लिए प्रयासरत था। ३० अगस्त को मैं कोलाबा में अपनी फेवरेट हेलेन जी का घर खोजते हुए संयोगवश नेपियन सी रोड की एम्बेसी बिल्डिंग तक पंहुच गया था ,जहाँ ग्राउंड फ्लोर पर स्थित फ्लैट न. १ में निरुपा रॉय रहती थी । सबसे पहले उनके पुत्र कृष्ण मिले ,उन्हें अपना परिचय देते हुए निरुपा जी के बारे में पूछा ,तो वो तुरंत उन्हें बुला लाये। मैं फ़िल्मी दुनिया की उस माँ को एकटक देखते रह गया , वो मुझसे कोई पूर्व परिचय ना होने पर भी सम्मानपूर्वक अपने घर के भीतर ले गयी , उस समय वो मैक्सी या गाउन पहनी थी , यद्दपि उनके चेहरे पर लम्बी बीमारी के वजह से काफी सूजन और मलिनता थी , फिर भी वो इतने उत्साह और स्नेह से मिली कि पल भर में उनके प्रति मेरी धारणा बदल गयी । वो बहुत सी फिल्मो में अभिताभ बच्चन की माँ बनी थी और अमिताभ जी उन्हें माँ के समान सम्मान देते थे। वास्तव में उस दिन उनके ममतापूर्ण मधुर व्यवहार से मुझे यूँ अहसास हुआ कि वो सचमुच पूरे देश की माँ है ।
मैं उनके पुराने पैटर्न के ड्राइंगरूम में सोफे पर बैठा था। वहां दीवारो पर अनेक पुराने महानायकों के साथ उनके फोटो लगे थे। उनसे फिल्म ,अभिनय ,रोल आदि के बारे में अनेक बाते हुई। उन्होंने मुझे अपने पति से भी मिलवाया ,जो काफी मृदुभाषी थे।उस समय मुझे उनकी एक फिल्म 'दीवार' का अभिताभ जी और शशि कपूर की वो चर्चित डॉयलॉगबाज़ी याद आ गयी कि 'आँय तुम्हारे पास क्या है ,मेरे पास बैंक बैलेंस , गाड़ी ,बंगला है ,मेरे पास माँ है ', यही तो वही माँ थी। मैंने जब कैमरे से उनका फोटो खींचना चाहा , तो उन्होंने मृदुलता से बीमारी के कारण चेहरा बिगड़ जाने के कारण इसके लिए मना करते हुए माफ़ी चाही और यह बोली कि मैं अपनी एक फोटो आपको देती हूँ। फिर उन्होंने मुझे अपना एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो अपने ऑटोग्राफ के साथ' विथ लव ' लिखकर दिया था । वह फोटो आज भी मेरे अल्बम में एक अमूल्य निधि के रूप में रखी हुई है।
जब मैंने उनसे विदा लेते हुए आदरभाव से उनके चरणस्पर्श किये ,तो उन्होंने मेरे सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए आशीर्वाद दिया था . इस यादगार मुलाकात के चंद दिनों बाद ही १३ अक्टूबर २००४ को निरुपा रॉय जी का निधन हो गया। जाने वाले चले जाते है और पीछे बाकी रह जाती है ,उनकी अमिट यादें। आज भी जब फ़िल्मी परदे पर निरुपा जी को देखता हूँ ,तो बरबस ही श्रद्वा और सम्मान से इस ममतामयी माँ के लिए मेरा सिर झुक जाता है और मन बहुत भावुक हो जाता है जब उनके साथ अपनी वास्तविक माँ को खो देने के जख्म टीसने लगते है।
- अनिल वर्मा
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