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Saturday, 14 February 2015

फिल्म ''नीली आँखें ''


    अजीत फिल्म ''नीली आँखें ''(१९६२) में

                                                        -अनिल वर्मा 
 
       

                    



                                           फिल्म '' नीली आखें '' सोसाइटी पिक्चर्स के बैनर तले  बनी थी. सन १९६२ में रिलीज़ इस फिल्म के निर्देशक वेद मारन और प्रोड्यूसर अब्दुल रहीम थे। अजीत की यह  एकलौती फिल्म है ,जिसमे  उनका डबल रोल नज़र आता है । उस दौर की निहायत खूबसूरत अदाकारा  शकीला उनकी  नायिका थी . उनके साथ फिल्म में हेलेन , राज मेहरा , तिवारी ,शेट्टी, जॉनी वॉकर , टुनटुन के भी अहम किरदार थे। निसंदेह यह एक दोयम दर्जे की फिल्म थी ,जिसकी कहानी बेहद  कमजोर थी ,निर्देशन भी औसत दर्जे का था , कलाकारों का अभिनय काफी साधारण था और इस मिस्ट्री का अंत इतना सोचा समझा था की हर दर्शक इंटरवल में ही फिल्म का अंत भाँप चुका था , नजीजा वही ढाक के तीन पात, फिल्म  फ्लॉप रही।

                                  फिर भी फिल्म का गीत -संगीत काफी उत्कृष्ट स्तर का था। अमर गायक मुकेश , मोह. रफ़ी , मन्ना डे ,सुमन कल्यानपुर ,गीता दत्त के गाये मधुर सुरीले गीतो ने फिल्म को जीवंत बनाये रखा था। गीतकार गुलशन बाबरा के गीतों को संगीत निर्देशक दाताराम वाडकर ने बखूबी सजाया सवांरा था।  फिल्म  में प्रमुख गीत इस प्रकार थे -(१ )ये नशीली हवा छा रहा नशा.…(२) नज़र का झुक जाना .…,(३) पंछी अब तू है जाल में धोका है तेरी चाल में .…(४ ) देखिये न इस तरह झूम के .…(५ ) ए  मेरी जाने वफ़ा .… (६ )  नज़रों का ऐसा कांटा ।


           फिल्म की कहानी कुछ इस प्रकार थी। लखपति सेठ  रायबहादुर (तिवारी) की इकलौती बेटी शीला (शकीला )एक गरीब कवि (अजीत प्रथम रोल)  से मोहब्बत करती है , लालची सेठ कही से हीरे हड़पने के चक्कर में है , एक अपराधी गैंग भी इसी फ़िराक में है।  कहानी आगे बढ़ती है ,जब शीला यह देखकर दंग रह जाती है कि उसका पिता अपने मरहूम दोस्त के जिस बेटे दिलीप (अजीत दूसरा रोल) को लंदन से लाता है, जो प्रेमी कवि का हमशक्ल है।  एक ज्योतिषी प्रेम यह भविष्वाणी करता है कि सेठ किसी घोर संकट में फँसने वाला है और दिलीप किसी का खून करेगा। परेशान शीला दिलीप पर नज़र रखने पंजवानी (जॉनी वाकर ) को कहती है , अचानक दिलीप कही गायब हो जाता है , फिर भारी मारधाड़ , खून खराबा और भागमभाग होती है ,हीरे भी चोरी हो जाते है।  आखिर यह पर्दाफाश हो जाता है कि दिलीप और कवि दोनों एक ही व्यक्ति अजीत है ,जो सी. आय. डी. ऑफिसर  है , प्रेम खूनी  है और सेठजी , प्रेम और उनका पार्टनर सब हीरे लूटना चाहते थे। हमेशा की तरह हीरो हीरोइन की शादी  के साथ फिल्म का सुखद अंत हो जाता है।
                                                                                                                              -अनिल वर्मा
                     

Thursday, 12 February 2015

                                                                                                                   - अनिल वर्मा 














                                            
                           निर्देशक के. अमरनाथ के होम प्रोडक्शन की सामाजिक ड्रामा की फिल्म '' बारात '' सन १९६० में रिलीज़ हुई थी।  इसमें हीरो अजीत ,हीरोइन शकीला के अलावा मुकरी ,प्रतिमा देवी ,सज्जन ,मुराद और सलीम खान थे।  जी हाँ , हमारे मशहूर सलीम जावेद की जोड़ी वाले संवाद लेखक और सलमान खान के पिता सलीम खान।  बहुत कम लोग जानते होंगे कि सलीम खान फिल्मों में बतौर एक्टर काम करने के लिये मुंबई आये थे और उन्होंने इसी फिल्म ‘बरात’ मेंअभिनय कर के अपने फ़िल्मी जीवन की शुरुआत की थी। 

                  इस फिल्म में अजीत और शकीला की बेहतरीन अदाकारी के अलावा मुकेश, मोह. रफ़ी , मन्ना डे ,लता मंगेशवर और गीता दत्त के सुरीले कर्णप्रिय गीत यादगार थे , मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों में  चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में इन महान गायको ने जादू फूँक दिया था।  आपने मुकेश का यह लोकप्रिय गीत 'मुफ्त में हुए बदनाम किसी से हाय दिल को लगा के ' जरूर सुना होगा।  इसके अलावा गीत 'चलो अब कहना मान भी जाओ ' , 'अरे जाने वाले हमारी गली आना ' , 'आपने कभी न कभी सुने जरूर होगे। एक बार यू ट्यूब पर इस पुरानी लोकप्रिय फिल्म को जरूर देखे।