Thursday, 12 February 2015

                                                                                                                   - अनिल वर्मा 














                                            
                           निर्देशक के. अमरनाथ के होम प्रोडक्शन की सामाजिक ड्रामा की फिल्म '' बारात '' सन १९६० में रिलीज़ हुई थी।  इसमें हीरो अजीत ,हीरोइन शकीला के लावा मुकरी ,प्रतिमा देवी ,सज्जन ,मुराद और सलीम खान थे।  जी हाँ , हमारे मशहूर सलीम जावेद की जोड़ी वाले संवाद लेखक और सलमान खान के पिता सलीम खान।  बहुत कम लोग जानते होंगे कि सलीम खान फिल्मों में बतौर एक्टर काम करने के लिये मुंबई आये थे और उन्होंने इसी फिल्म ‘बरात’ मेंअभिनय कर के अपने फ़िल्मी जीवन की शुरुआत की थी। 

                  इस फिल्म में अजीत और शकीला की बेहतरीन अदाकारी के अलावा मुकेश, मोह. रफ़ी , मन्ना डे ,लता मंगेशवर और गीता दत्त के सुरीले कर्णप्रिय गीत यादगार थे , मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों में  चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में इन महान गायको ने जादू फूँक दिया था।  आपने मुकेश का यह लोकप्रिय गीत 'मुफ्त में हुए बदनाम किसी से हाय दिल को लगा के ' जरूर सुना होगा।  इसके अलावा गीत 'चलो अब कहना मान भी जाओ ' , 'अरे जाने वाले हमारी गली आना ' , 'आपने कभी न कभी सुने जरूर होगे। एक बार यू ट्यूब पर इस पुरानी लोकप्रिय फिल्म को जरूर देखे

Wednesday, 11 February 2015

                                फिल्म '' मेहंदी '' (१९५८) 
                                                           -अनिल वर्मा 

                             अजीत और जयश्री गडकर द्वारा अभिनीत फिल्म '' मेहँदी '' १५ सितम्बर १९५८ को रिलीज़ हुई थी। वास्तव में फिल्म इतिहास में अब तक मेहंदी नाम की कुल फिल्म्स बनायीं जा चुकी है ,  जो कि सन १९४७, १९५८ , १९८३ एवं १९९८ में रिलीज़ हुई है। १९५८ की पुष्पा पिक्चर्स की इस फिल्म के प्रोडयूसर ए.ए. नाडियाडवाला और निर्देशक एस. एम. युसूफ थे। अन्य प्रमुख कलाकार ललिता पवाँर ,मुजफ्फर अदीब ,एम कुमार,वीना और बालम थे। फिल्म में संगीत रवि का था और  यह हेमंत कुमार , मोह. रफ़ी एवं लता मंगेश्वर जी दिलकश गीतों और कव्वाली ,मुजरा से परिपूर्ण संगीतमय फिल्म  थी। इस फिल्म का प्रख्यात गीत ' बेदर्द जमाना तेरा दुश्मन है तो क्या है दुनिया में नहीं जिसका कोई उसका खुदा है ' आज भी लोग गुनगुनाते है



Thursday, 29 January 2015


            हॉकी के गौरव जशवंत सिंह राजपूत: अब यादें ही शेष 

                                                                                                                   - अनिल वर्मा 
                                                                                                       
            '  वह भारत को गौरवान्वित करने वाली जमात के सितारे थे '.भू. पू. भारतीय कप्तान गुरुबक्स सिंह द्वारा जशवंत सिंह राजपूत के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित बाबत व्यक्त उद्गार बखूबी उनकी यशगाथा को बयां करते थे। देश को लगातार २ ओलम्पिक में स्वर्णपदक जीतने का गौरव दिलाने वाले हॉकी ओलम्पियन जशवंत सिंह का गत २८-१-२०१५ को कोलकोता के सिटी हॉस्पिटल में निधन हो गया।  भारत पर २०० वर्ष तक राज्य करने वाले अंग्रेजो को स्वाधीनता प्राप्ति के चंद दिनों उपरांत ही  उनकी राजधानी में सन १९४८ लंदन ओलम्पिक में धूल चटाकर तिरंगा फहराने वाली ऐतिहासिक भारतीय टीम में जशवन्तसिंह भी शामिल थे।

                                         जशवंत सिंह का जन्म १९२६ को दिल्ली में हुआ था।  स्कूल में पढ़ने के दौरान ही उनकी हॉकी प्रतिभा में निखार आना आरंभ हो गया था , फिर उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लिए उत्कृष्ट खेल से राष्ट्रीय चयनकर्ताओं को अपनी ओर आकृष्ट किया और उन्हें तत्काल ही लंदन ओलिंपिक के लिए भारतीय टीम में लेफ्ट हाफ की पोजीशन पर ले लिया गया ,भारतीय टीम अपने शानदार खेल से
ओलिंपिक के फाइनल में पहुंची , तब अंतिम मुकाबले में भारत ने ब्रिटेन को ४-० से अंतर से हराकर उसके दम्भ को चूर चूर कर दिया था. जशवंत सिंह वेम्बले स्टेडियम लंदन में तिरंगे फहराने के उन स्वर्णिम पल को आजीवन गर्व के साथ याद करते रहे .वह कहते थे हमारा झंडा उनकी धरती पर था, इससे ज्यादा ओर हम क्या चाह सकते थे।  

                                                        जशवंत पहले लेफ्ट हाफ खेलते थे , फिर वह सेंटर हाफ की पोजीशन पर खेलने लगे,उन्हें ड्रिब्लिंग के कौशल और गेंद पर नियंत्रण में महारथ हासिल थी। लंदन ओलिंपिक से लौटने के बाद वह कोलकोता जाकर भवानीपुर क्लब के लिए खेलने लगे , सन १९५२ में वह मोहन बागान में चले गए और F.A . कप में खिताबी जीत के सूत्रकार बने।  इसके बाद उन्होंने हेलसिंकी ओलम्पिक खेलों में भी देश का प्रतिनिधित्व कर   पुनः स्वर्णपदक जीतने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हेलसिंकी से वापस लौटने के बाद उन्होंने हॉकी से सन्यास  ले लिया ,इसका कारण  यह था कि उन्होंने कोलकोता में देश का सबसे बड़ा सर्विस स्टेशन आरंभ किया था ,उन्हें लगा कि लोग यह न कहे कि वह हॉकी को १००% नहीं दे रहे है ,इसलिए उन्होंने अपने पहले प्यार हॉकी को छोड़ दिया ,उनका दूसरा प्यार उनका प्यारा शहर कोलकोता था , जिसे उन्होंने पत्नी के निधन के बाद अकेला रहने पर भी नहीं छोड़ा था और बेटी के कहने पर भी उसके साथ कनाडा नहीं गए।

                                                   हॉकी ओलम्पियन  लेज़ली क्लाडियस उनके सबसे घनिष्ठ मित्र थे ,वह प्रतिदिन सुबह के समय अपने मित्रो के साथ घूमना पसंद करते थे। वह कहते थे कि उनके समय में हॉकी खेलना सम्मान और गौरव की बात थी ,पर अब हॉकी का पतन हो गया है , वह भारतीय हॉकी से बेहद हताश थे और कभी भी भारत के मैच  नहीं देखते थे।  उनके अंतिम पसंदीदा खिलाडी धनराज पिल्लै थे ,वह पूर्व खिलाड़ियों को हॉकी का प्रशासन सौपा जाने की राय देते थे। अंतिम दिनों मेंअपनी भांजी के साथ वह पार्क स्ट्रीट कोलकोता के निकट बोर्डफोर्ड लेन में रह रहे थे। उनकी मृत्यु के साथ भारतीय हॉकी के एक और सुनहरे युग का अंत हो गया है।  
                                                                                                                     -  अनिल वर्मा

Thursday, 16 October 2014

                                                                        अजीत
                                                         - अनिल वर्मा 
 
                                         प्रख्यात फिल्म अभिनेता अजीत जिन्हें सारी दुनिया लॉयन के नाम से जानती थी, उनकी आवाज शेर की भांति बुलंद थी। वह पांच दशक तक भारतीय फिल्म जगत में अजेय रहे। अजीत के परदे पर आगमन से ही दर्शकों के दिल दहल उठते थे ।खलनायकी के बेताज बादशाह अजीत को कौन नहीं जानता , याद कीजिये फिल्म कालीचरण का वह सीन जिसमे सेठ दीनदयाल ( अजीत)  बड़ी नफ़ाज़त से खून को जमा देने वाली सर्द आवाज़ में इंस्पेक्टर प्रभाकर श्रीवास्तव   (शत्रुधन सिन्हा )से कहते है   ''  डी. एस.पी. साहब , सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है  '' . 

                    अजीत  के रौबदार और प्रभावशाली व्यक्तित्व और उनके लम्बे फ़िल्मी जीवन की सुनहरी दास्ताँ बयां करने के लिए इस फेसबुक  ग्रुप '' Film Actor Ajit '' में आपका स्वागत है। 
                                                                                                              
                                                                                - अनिल वर्मा

Thursday, 9 October 2014

                                           गुरु दत्त की ५० वीं पुण्यतिथि 
                                                                        - अनिल वर्मा

            


 


                 आज से ठीक ५० साल पहले वह रहस्यमय बदनसीब रात थी , जिसने गुरु दत्त को सदैव के लिए हमसे छीन लिया . उनकी मौत महज एक हादसा थी या ख़ुदकुशी ,यह रहस्य १९६४ में जहाँ था  , आज भी वही है , उनकी मौत की अबूझ पहेली शायद कभी सुलझ न सकेगी। 

                             यह कहा जाता है कि  गुरु दत्त ने वहीदा रहमान की बेवफाई के कारण उनका दिल टूट गया था , और वह गहन हताशा में डूब गए थे , पत्नी गीता को वो कभी वापस नहीं पा सकते थे। इसलिए उन्होंने मौत को ही गले लगाना बेहतर था। गुरदत्त के निधन के बाद वहीदा ने एक बयान जारी किया था। जिसमें उन्होंने कहा था  “ऊपरवाले ने उन्हें सबकुछ दिया था लेकिन उन्हें संतोष नहीं था , वह कभी संतुष्ट नहीं होते थे।  शायद इसीलिए जो चीज उन्हें जिंदगी नहीं दे पा रही थी, उसे उन्होंने मौत में तलाशा।  उन्हें पूर्ण संतुष्टी की तलाश थी। कोई तृप्ति, कोई मौत, कोई अंत, कोई पूर्णता वह चाहते थे। मुझे नहीं पता उनकी मौत दुर्घटना थी या घटना, लेकिन इतना जानती हूं, उन्हें कोई नहीं बचा सकता था। उनमें बचने की चाह ही नहीं थी। मैंने उन्हें कई बार समझाने की कोशिश की कि जिंदगी में सब कुछ नहीं मिल सकता और मौत हर सवाल का जवाब नहीं है। मगर वे नहीं माने। मैं जानती हूं वो मौत से मोहब्बत करते थे, बेपनाह मोहब्बत, इसलिए उन्होंने इसे गले लगा लिया।”

                      इस दुनिया से जाने वाले कभी लौट कर वापस नहीं आते ,बस उनकी यादें शेष रह जाती है। गुरुदत्त जी सिनेमा के रुपहले परदे पर और हम सब प्रशंसकों के दिलो में हमेशा अमर रहेंगे .हम सब की ओर से महानायक गुरु दत्त को आँसूओं से धुँधली हो रही नज़रों और भरे हुई  कंठ के साथ उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित है।
                                                                                                                            - अनिल वर्मा

Monday, 29 September 2014

शहीद भगत सिंह की बहन बीबी प्रकाश कौर

                    शहीद भगत सिंह की बहन बीबी प्रकाश कौर 
                                                                  - अनिल वर्मा 



                                                         
            

                          
                                                 शेरे हिन्द सरदार भगत सिंह के परिवार को देशभक्ति ,त्याग और बलिदान के अनुपम गुण विरासत में मिले सच्चे मोतियों के समान थे . उनके यशस्वी पिता  किशनसिंह और माता विद्यावती की कुल ९ संतान जगत सिंह , भगत सिंह , बीबी अमर कौर , कुलबीर सिंह , बीबी शकुंतला देवी ,कुलतार सिंह , बीबी प्रकाश कौर , रणवीर सिंह और रजिन्दरसिंह थी , इनमे से जगत सिंह का  तो काफी पहले ही युवावस्था में निधन हो गया  गया था  , फिर इसके बाद   भगत सिंह ने २३ वर्ष की अल्पायु में देश के लिए फांसी के फंदे पर झूलकर शहीद हो गए थे और इससे पूरे देशवासियों  के साथ ही उनके भाई बहिनो में भी देशभक्ति का जो अनूठा जज्बा जाग्रत हुआ था , वह उन सब में आजीवन यथावत कायम रहा .

                                               प्रकाश कौर जी का जन्म पाकिस्तान के लायलपुर जिले में गांव खासडिय़ां में १९१९  में हुआ था , उन्हें घर में लोग सुमित्रा के नाम से जानते थे ,उन्हें अपने प्रिय प्राजी भगत सिंह के साथ रहने और खेलने कूदने का कम ही अवसर मिल सका , भगत सिंह अल्प  आयु में ही क्रांति के पथ पर चल पड़े थे , वह जान बूझकर घर परिवार से दूर रहते थे , ताकि उनके क्रान्तिकारी अभियानों में कोई  बाधा न पहुंचे। २३ मार्च १९३१ को भगत सिंह की शहादत के समय प्रकाश केवल १० वर्ष की थी, पर इस घटना ने उन पर गहरा असर डाला था और वह अपने महान भाई के बलिदान गाथाओं से वह पूरे जीवन भर गौरव अनुभूत  रही ।


                                            बीबी प्रकाश कौर का विवाह राजस्थान के गंगानगर  जिला की पदमपुर तहसील के ५ एन एन  के हरबंश सिंह मलहि के साथ हुआ था , प्रकाश कौर में अपने भाई भगत सिंह के समान अदम्य साहस और संघर्ष का अनूठा ज़ज्बा था , वह ६ फीट ऊंची कदकाठी  की   रौबदार व्यक्तित्व की थीं। १९४७ में देश के बटँवारे की त्रासदी में उन्होंने दंगे रोकने और लोगो के पुनर्वास में अहम दायित्व का निर्वाह किया था।  वर्ष १९६७ में पंजाब विधानसभा के आम चुनावों में उन्होंने भारतीय जनसंघ की टिकट पर कोटकपूरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा है,  तब  अकाली दल के उम्मीदवार हरभगवान सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी मेहर सिंह को हराया था, जबकि प्रकाश कौर करीब पांच हजार मत लेकर तीसरे स्थान पर रही थीं । उस समय भारतीय जनसंघ के सीनियर नेता एडवोकेट श्रीराम गुप्ता की अगुवाई में प्रकाश कौर के समर्थन में जोरदार चुनावी मुहिम चली थी और चुनाव प्रचार में शहीद भगत सिंह की माता समेत परिवार के अन्य सदस्य भी शामिल हुए थे।

             सन १९८० में बीबी प्रकाश कौर अपने पति और दोनों पुत्र रुपिंदरसिंह और हकमत सिंह के साथ कनाडा चली गयी और वहीं बस गयी थी , करीब १९९५ में   उनके पति  का निधन हो गया था जबकि इनकी दो बेटियां गुरजीत कौर व परविंदर कौर होशियारपुर के गांव अंबाला जट्टां के एक ही परिवार में शादीशुदा हैं। गुरजीत कौर अभी गांव में ही हैं व जबकि परविंदर कौर कनाडा में रहती हैं।

                            इस देश की विडम्बना है कि हमने जिन शहीदों और क्रांतिवीरो के अपार त्याग और बलिदान से यह आज़ादी पायी है , उन्हें भुला दिया गया है , उन्हें और उनके वीर परिवारों को सम्मान देना तो दूर रहा , हमारी पाठ्य पुस्तकों में भगत सिंह और आज़ाद जैसे महान क्रांतिकारियों को आतंकवादी लिखा जा रहा है।  यह दुखद और  कटु सत्य है कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह के  एक रिश्तेदार को आतंकवादी करार देकर पुलिस द्वारा फ़र्ज़ी एनकाउंटर में  गोली मारकर हत्या कर दी गयी और उनके परिजन न्याय  के लिए पिछले २५ साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था , तब १९८९ में प्रकाश कौर की बेटी  सुरजीत कौर के दामाद के भाई और ओलंपियन धर्म सिंह के दामाद अम्बाला के जत्तन गांव के रहने वाले कुलजीत  रहस्यमय ढंग से गायब हो गए थे, उन्हें होशियारपर के गरही  गावं से पंजाब पुलिस ने पकड़ा था ,तब से वह लापता है और ऐसा विश्वास है कि पुलिस ने उनकी हत्या कर दी थी।

                    भगत सिंह की वीरांगना बहन  बीबी  प्रकाश कौर इस मामले में लगातार कनाडा से भारत आकर न्याय के संघर्ष में जुटी रही ,उनके द्वारा  सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी रिट याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट को मामला शीघ्र निपटने के दिशा-निर्देश दिए थे और होशियारपुर के सेशन कोर्ट को जल्दी मामले में सुनवाई पूरी करने के लिए कहा है। जिसके बाद से सुरजीत को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है। सुरजीत का परिवार 1989 से ही कुलजीत की रिहाई के लिए प्रयासरत था। बाद में पुलिस ने कहा कि जब कुलजीत को हथियारों की पहचान के लिए ब्यास नदी के नजदीक ले जाया गया था तो वह उसकी गिरफ्त से निकलकर भाग गया था।प्रकाश कौर ने सितंबर 1989 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग गठित किया। आयोग ने अक्टूबर 1993 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में पंजाब पुलिस अधिकारी एस. एस.पी अजीत सिंह संधु (जिसने १९९७ में आत्महत्या कर ली ), डी . एस.पी. जसपाल सिंह ,सार्दुलसिंह , एस.पी.एस. बसरा , सीताराम को प्रथम दृष्टया दोषी  होना इंगित किया गया था और यह कहा गया कि पुलिस की कुलजीत के भागने की कहानी काल्पनिक है। यह दुर्भाग्य है कि बीबी प्रकाश कौर के जीवनकाल में यह मामला अंतिम रूप से निराकृत नहीं हो पाया .
 
                                        बीबी प्रकाश कौर का  ९४ वर्ष की आयु में गत २८ सितम्बर २०१४  को उनके  भाई शहीद-'ए-आजम भगत सिंह के जन्मदिन पर ही  ब्रंटन (टोरंटो ) कनाडा में देहांत हो गया है । उस दिनमृत्यु के पूर्व  परिवार के लोग  उनसे मिले थे ,भगत सिंह की चर्चा किये और उनका आशीर्वाद लिए थे।  वह करीब ६ वर्ष से वह लकवा से पीड़ित थी और बिस्तर पर ही थी । उनके देहांत की जानकारी पंजाब के होशियारपुर में रहने वाले उनके दामाद हरभजन सिंह दत्‍त ने दी। अब भगतसिंह के कोई भी भाई बहन जीवित नहीं बचे है ।   बीबी  प्रकाश कौर ने मृत्यु के चार दिन पहले बुलंद हौंसले के साथ अपनी बेटी गुरजीत कौर से कनाडा में यह कहा था कि जिंदगी में कभी हौंसला मत हारना। प्रकाश कौर तो अपने महान भाई का अनुसरण करते हुए अपना पूरा जीवन बुलंद हौसलों के साथ भरपूर जियी , उन्होंने अपनी राखी हमारी आज़ादी के हवन कुण्ड में समर्पित कर दी थी , पर  हम कृतघ्न देशवासी उन्हें सम्मानपूर्वक श्रद्धांजलि भी नहीं दे सके है , यह उनका नहीं वरन हमारा ही दुर्भाग्य है।  
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    -अनिल वर्मा                     








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Wednesday, 24 September 2014

                                                      अलविदा अलविदा 
                                                   -अनिल वर्मा

                              ' उदास है आसमां के चाँद सितारे , बुझे बुझे है जहाँ के नज़ारे ,
                              हसीं बहारे भी बेपनाह रो रही है ,अलविदा ये महफ़िल कह रही है ''


                          जब अमिता जी के दुनिया से अलविदा हो जाने के बारे में जब  अश्वनी से दुखद खबर मिली , तो सहसा यह विश्वास ही नहीं हुआ कि  हमारे क्लास की आन ,बान और शान अमिता दुबे (कानूनगो ) अब हमारे बीच नहीं रही है . गत २० मई २०१४ को उनका दुःखद निधन हो गया।

                    अमिता जी  हमारे साथ सन १९७७ से १९८० तक क्लास ९ से ११ तक साथ पढ़ी थी , पढ़ाई में वह सर्वोत्तम थी ही , साथ ही वो तीनो साल हमारी क्लास की मॉनिटर रही , निसंदेह वो क्लास की सबसे सम्मानित विद्यार्थी थी , उनका लम्बा कद , चश्मे के साथ मुस्कराहट से खिला उनका खूबसूरत चेहरा,मुझे याद आज भी है। मैंने सन १९८० के बाद उन्हें देखा भी नहीं ,पर वह हमारे स्कूल जीवन की सुनहरी यादों का हिस्सा थी , उनका हर कार्य और आचरण आदर्श रूप में रहता था , वो बहुत ही विनम्र ,मृदुभाषी और शालीन थी , हम लोगो को उन पर गर्व था और सबके मन में उनके लिए बहुत सम्मान था , 
                      
                    विनम्रता और सौम्यता से परिपूर्ण गरिमामयी प्रभावशाली व्यक्तित्व अमिता की अनूठी पहचान थी, उनका जन्म ३० अक्टूबर १९६३ को हुआ था और १८ जनवरी १९८९ को उनका विवाह  हुआ था ,  ,उनकी २ बेटी  हैं , वो अपने खुशहाल परिवार के साथ विजय नगर इंदौर में रहती थी।   

                         क्लास के री-यूनियन फक्शन के लिए उनमें काफी उत्साह था , हम उनके सहयोग से इस दिशा में आगे बढ़ रहे थे .उनका असमायिक निधन हम सब के लिए बेहद दुखद है, उन्होंने गुजराती समाज स्कूल रतलाम  से 11th करने के बाद रतलाम से बी.एस सी. किया था ,फिर इंदौर के गवर्नमेंट गर्ल्स कॉलेज से केमिस्ट्री में M.Sc. किया था ।
                उनके निधन से हमने अपनी एक शानदार सहपाठी को हमेशा के लिए खो दिया है , ग्रुप की ओर से भेजे गए संवेदना सन्देश पर अमिता जी के पति श्री आशुतोष कानूनगो जी ने यह जबाब भेजा था कि  .... ''अमिता के निधन पर आपके द्वारा प्रकट संवेदना के लिए ह्रदय से आभार । अमिता को पत्नी एवं माँ के रूप में खोना मेरे व बच्चों के लिए अपूर्णीय क्षति है।वे अपनी सुनहरी यादों के साथ सदा हमारे बीच रहेंगी।''आशुतोष जी ने बताया कि अमिता जी पिछले ५ वर्षो से कैंसर से पीड़ित थी , पर यह उनकी जिंदादिली और जीवटता थी कि वह किसी को भी इसके बारे में नहीं बताती थी और मुश्किल हालात में भी खुश और सक्रिय रहने की कोशिश करती थी ।वह अंतिम दिनों में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करती रही ,आखिर मौत ने बाज़ी मार ली।
                         मैंने उन्हें स्कूल छोड़ने के ३२ साल बाद फेस बुक के माधयम से खोजा था वह क्लास के री-यूनियन फंक्शन के लिए गर्ल्स क्लासमेट को खोजने में काफी मदद कर रही थी ,मेरी अमिता जी से अंतिम बार करीब ४ माह पहले फ़ोन पर बात हुए थी , काश हमे उनकी सिमटती हुई जिंदगी का रंच मात्र भी अहसास होता, तो हम जल्दी ही सभी मित्रो को एकत्र कर पुनर्मिलन समारोह आयोजित कर लेते , कम से कम मिल ही लेते , मन में एक कशिश रह गई . अमिता ने दुनिया को अलविदा कह दिया है , पर हम सब की यादों में वह सदा अमर रहेगी। परम पिता ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और उनके परिवार को यह असीम दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करे.
अलविदा अमिता..........

                         '' ना पीछे मुड़कर देखों  ना  आवाज़ दो मुझको ,
                            बड़ी मुश्किल से सीखा है मैंने अलविदा कहना। ''