Thursday, 16 October 2014

                                                                        अजीत
                                                         - अनिल वर्मा 
 
                                         प्रख्यात फिल्म अभिनेता अजीत जिन्हें सारी दुनिया लॉयन के नाम से जानती थी, उनकी आवाज शेर की भांति बुलंद थी। वह पांच दशक तक भारतीय फिल्म जगत में अजेय रहे। अजीत के परदे पर आगमन से ही दर्शकों के दिल दहल उठते थे ।खलनायकी के बेताज बादशाह अजीत को कौन नहीं जानता , याद कीजिये फिल्म कालीचरण का वह सीन जिसमे सेठ दीनदयाल ( अजीत)  बड़ी नफ़ाज़त से खून को जमा देने वाली सर्द आवाज़ में इंस्पेक्टर प्रभाकर श्रीवास्तव   (शत्रुधन सिन्हा )से कहते है   ''  डी. एस.पी. साहब , सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है  '' . 

                    अजीत  के रौबदार और प्रभावशाली व्यक्तित्व और उनके लम्बे फ़िल्मी जीवन की सुनहरी दास्ताँ बयां करने के लिए इस फेसबुक  ग्रुप '' Film Actor Ajit '' में आपका स्वागत है। 
                                                                                                              
                                                                                - अनिल वर्मा

Thursday, 9 October 2014

                                           गुरु दत्त की ५० वीं पुण्यतिथि 
                                                                        - अनिल वर्मा

            


 


                 आज से ठीक ५० साल पहले वह रहस्यमय बदनसीब रात थी , जिसने गुरु दत्त को सदैव के लिए हमसे छीन लिया . उनकी मौत महज एक हादसा थी या ख़ुदकुशी ,यह रहस्य १९६४ में जहाँ था  , आज भी वही है , उनकी मौत की अबूझ पहेली शायद कभी सुलझ न सकेगी। 

                             यह कहा जाता है कि  गुरु दत्त ने वहीदा रहमान की बेवफाई के कारण उनका दिल टूट गया था , और वह गहन हताशा में डूब गए थे , पत्नी गीता को वो कभी वापस नहीं पा सकते थे। इसलिए उन्होंने मौत को ही गले लगाना बेहतर था। गुरदत्त के निधन के बाद वहीदा ने एक बयान जारी किया था। जिसमें उन्होंने कहा था  “ऊपरवाले ने उन्हें सबकुछ दिया था लेकिन उन्हें संतोष नहीं था , वह कभी संतुष्ट नहीं होते थे।  शायद इसीलिए जो चीज उन्हें जिंदगी नहीं दे पा रही थी, उसे उन्होंने मौत में तलाशा।  उन्हें पूर्ण संतुष्टी की तलाश थी। कोई तृप्ति, कोई मौत, कोई अंत, कोई पूर्णता वह चाहते थे। मुझे नहीं पता उनकी मौत दुर्घटना थी या घटना, लेकिन इतना जानती हूं, उन्हें कोई नहीं बचा सकता था। उनमें बचने की चाह ही नहीं थी। मैंने उन्हें कई बार समझाने की कोशिश की कि जिंदगी में सब कुछ नहीं मिल सकता और मौत हर सवाल का जवाब नहीं है। मगर वे नहीं माने। मैं जानती हूं वो मौत से मोहब्बत करते थे, बेपनाह मोहब्बत, इसलिए उन्होंने इसे गले लगा लिया।”

                      इस दुनिया से जाने वाले कभी लौट कर वापस नहीं आते ,बस उनकी यादें शेष रह जाती है। गुरुदत्त जी सिनेमा के रुपहले परदे पर और हम सब प्रशंसकों के दिलो में हमेशा अमर रहेंगे .हम सब की ओर से महानायक गुरु दत्त को आँसूओं से धुँधली हो रही नज़रों और भरे हुई  कंठ के साथ उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित है।
                                                                                                                            - अनिल वर्मा

Monday, 29 September 2014

शहीद भगत सिंह की बहन बीबी प्रकाश कौर

                    शहीद भगत सिंह की बहन बीबी प्रकाश कौर 
                                                                  - अनिल वर्मा 



                                                         
            

                          
                                                 शेरे हिन्द सरदार भगत सिंह के परिवार को देशभक्ति ,त्याग और बलिदान के अनुपम गुण विरासत में मिले सच्चे मोतियों के समान थे . उनके यशस्वी पिता  किशनसिंह और माता विद्यावती की कुल ९ संतान जगत सिंह , भगत सिंह , बीबी अमर कौर , कुलबीर सिंह , बीबी शकुंतला देवी ,कुलतार सिंह , बीबी प्रकाश कौर , रणवीर सिंह और रजिन्दरसिंह थी , इनमे से जगत सिंह का  तो काफी पहले ही युवावस्था में निधन हो गया  गया था  , फिर इसके बाद   भगत सिंह ने २३ वर्ष की अल्पायु में देश के लिए फांसी के फंदे पर झूलकर शहीद हो गए थे और इससे पूरे देशवासियों  के साथ ही उनके भाई बहिनो में भी देशभक्ति का जो अनूठा जज्बा जाग्रत हुआ था , वह उन सब में आजीवन यथावत कायम रहा .

                                               प्रकाश कौर जी का जन्म पाकिस्तान के लायलपुर जिले में गांव खासडिय़ां में १९१९  में हुआ था , उन्हें घर में लोग सुमित्रा के नाम से जानते थे ,उन्हें अपने प्रिय प्राजी भगत सिंह के साथ रहने और खेलने कूदने का कम ही अवसर मिल सका , भगत सिंह अल्प  आयु में ही क्रांति के पथ पर चल पड़े थे , वह जान बूझकर घर परिवार से दूर रहते थे , ताकि उनके क्रान्तिकारी अभियानों में कोई  बाधा न पहुंचे। २३ मार्च १९३१ को भगत सिंह की शहादत के समय प्रकाश केवल १० वर्ष की थी, पर इस घटना ने उन पर गहरा असर डाला था और वह अपने महान भाई के बलिदान गाथाओं से वह पूरे जीवन भर गौरव अनुभूत  रही ।


                                            बीबी प्रकाश कौर का विवाह राजस्थान के गंगानगर  जिला की पदमपुर तहसील के ५ एन एन  के हरबंश सिंह मलहि के साथ हुआ था , प्रकाश कौर में अपने भाई भगत सिंह के समान अदम्य साहस और संघर्ष का अनूठा ज़ज्बा था , वह ६ फीट ऊंची कदकाठी  की   रौबदार व्यक्तित्व की थीं। १९४७ में देश के बटँवारे की त्रासदी में उन्होंने दंगे रोकने और लोगो के पुनर्वास में अहम दायित्व का निर्वाह किया था।  वर्ष १९६७ में पंजाब विधानसभा के आम चुनावों में उन्होंने भारतीय जनसंघ की टिकट पर कोटकपूरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा है,  तब  अकाली दल के उम्मीदवार हरभगवान सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी मेहर सिंह को हराया था, जबकि प्रकाश कौर करीब पांच हजार मत लेकर तीसरे स्थान पर रही थीं । उस समय भारतीय जनसंघ के सीनियर नेता एडवोकेट श्रीराम गुप्ता की अगुवाई में प्रकाश कौर के समर्थन में जोरदार चुनावी मुहिम चली थी और चुनाव प्रचार में शहीद भगत सिंह की माता समेत परिवार के अन्य सदस्य भी शामिल हुए थे।

             सन १९८० में बीबी प्रकाश कौर अपने पति और दोनों पुत्र रुपिंदरसिंह और हकमत सिंह के साथ कनाडा चली गयी और वहीं बस गयी थी , करीब १९९५ में   उनके पति  का निधन हो गया था जबकि इनकी दो बेटियां गुरजीत कौर व परविंदर कौर होशियारपुर के गांव अंबाला जट्टां के एक ही परिवार में शादीशुदा हैं। गुरजीत कौर अभी गांव में ही हैं व जबकि परविंदर कौर कनाडा में रहती हैं।

                            इस देश की विडम्बना है कि हमने जिन शहीदों और क्रांतिवीरो के अपार त्याग और बलिदान से यह आज़ादी पायी है , उन्हें भुला दिया गया है , उन्हें और उनके वीर परिवारों को सम्मान देना तो दूर रहा , हमारी पाठ्य पुस्तकों में भगत सिंह और आज़ाद जैसे महान क्रांतिकारियों को आतंकवादी लिखा जा रहा है।  यह दुखद और  कटु सत्य है कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह के  एक रिश्तेदार को आतंकवादी करार देकर पुलिस द्वारा फ़र्ज़ी एनकाउंटर में  गोली मारकर हत्या कर दी गयी और उनके परिजन न्याय  के लिए पिछले २५ साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था , तब १९८९ में प्रकाश कौर की बेटी  सुरजीत कौर के दामाद के भाई और ओलंपियन धर्म सिंह के दामाद अम्बाला के जत्तन गांव के रहने वाले कुलजीत  रहस्यमय ढंग से गायब हो गए थे, उन्हें होशियारपर के गरही  गावं से पंजाब पुलिस ने पकड़ा था ,तब से वह लापता है और ऐसा विश्वास है कि पुलिस ने उनकी हत्या कर दी थी।

                    भगत सिंह की वीरांगना बहन  बीबी  प्रकाश कौर इस मामले में लगातार कनाडा से भारत आकर न्याय के संघर्ष में जुटी रही ,उनके द्वारा  सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी रिट याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट को मामला शीघ्र निपटने के दिशा-निर्देश दिए थे और होशियारपुर के सेशन कोर्ट को जल्दी मामले में सुनवाई पूरी करने के लिए कहा है। जिसके बाद से सुरजीत को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है। सुरजीत का परिवार 1989 से ही कुलजीत की रिहाई के लिए प्रयासरत था। बाद में पुलिस ने कहा कि जब कुलजीत को हथियारों की पहचान के लिए ब्यास नदी के नजदीक ले जाया गया था तो वह उसकी गिरफ्त से निकलकर भाग गया था।प्रकाश कौर ने सितंबर 1989 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग गठित किया। आयोग ने अक्टूबर 1993 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में पंजाब पुलिस अधिकारी एस. एस.पी अजीत सिंह संधु (जिसने १९९७ में आत्महत्या कर ली ), डी . एस.पी. जसपाल सिंह ,सार्दुलसिंह , एस.पी.एस. बसरा , सीताराम को प्रथम दृष्टया दोषी  होना इंगित किया गया था और यह कहा गया कि पुलिस की कुलजीत के भागने की कहानी काल्पनिक है। यह दुर्भाग्य है कि बीबी प्रकाश कौर के जीवनकाल में यह मामला अंतिम रूप से निराकृत नहीं हो पाया .
 
                                        बीबी प्रकाश कौर का  ९४ वर्ष की आयु में गत २८ सितम्बर २०१४  को उनके  भाई शहीद-'ए-आजम भगत सिंह के जन्मदिन पर ही  ब्रंटन (टोरंटो ) कनाडा में देहांत हो गया है । उस दिनमृत्यु के पूर्व  परिवार के लोग  उनसे मिले थे ,भगत सिंह की चर्चा किये और उनका आशीर्वाद लिए थे।  वह करीब ६ वर्ष से वह लकवा से पीड़ित थी और बिस्तर पर ही थी । उनके देहांत की जानकारी पंजाब के होशियारपुर में रहने वाले उनके दामाद हरभजन सिंह दत्‍त ने दी। अब भगतसिंह के कोई भी भाई बहन जीवित नहीं बचे है ।   बीबी  प्रकाश कौर ने मृत्यु के चार दिन पहले बुलंद हौंसले के साथ अपनी बेटी गुरजीत कौर से कनाडा में यह कहा था कि जिंदगी में कभी हौंसला मत हारना। प्रकाश कौर तो अपने महान भाई का अनुसरण करते हुए अपना पूरा जीवन बुलंद हौसलों के साथ भरपूर जियी , उन्होंने अपनी राखी हमारी आज़ादी के हवन कुण्ड में समर्पित कर दी थी , पर  हम कृतघ्न देशवासी उन्हें सम्मानपूर्वक श्रद्धांजलि भी नहीं दे सके है , यह उनका नहीं वरन हमारा ही दुर्भाग्य है।  
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    -अनिल वर्मा                     








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Wednesday, 24 September 2014

                                                      अलविदा अलविदा 
                                                   -अनिल वर्मा

                              ' उदास है आसमां के चाँद सितारे , बुझे बुझे है जहाँ के नज़ारे ,
                              हसीं बहारे भी बेपनाह रो रही है ,अलविदा ये महफ़िल कह रही है ''


                          जब अमिता जी के दुनिया से अलविदा हो जाने के बारे में जब  अश्वनी से दुखद खबर मिली , तो सहसा यह विश्वास ही नहीं हुआ कि  हमारे क्लास की आन ,बान और शान अमिता दुबे (कानूनगो ) अब हमारे बीच नहीं रही है . गत २० मई २०१४ को उनका दुःखद निधन हो गया।

                    अमिता जी  हमारे साथ सन १९७७ से १९८० तक क्लास ९ से ११ तक साथ पढ़ी थी , पढ़ाई में वह सर्वोत्तम थी ही , साथ ही वो तीनो साल हमारी क्लास की मॉनिटर रही , निसंदेह वो क्लास की सबसे सम्मानित विद्यार्थी थी , उनका लम्बा कद , चश्मे के साथ मुस्कराहट से खिला उनका खूबसूरत चेहरा,मुझे याद आज भी है। मैंने सन १९८० के बाद उन्हें देखा भी नहीं ,पर वह हमारे स्कूल जीवन की सुनहरी यादों का हिस्सा थी , उनका हर कार्य और आचरण आदर्श रूप में रहता था , वो बहुत ही विनम्र ,मृदुभाषी और शालीन थी , हम लोगो को उन पर गर्व था और सबके मन में उनके लिए बहुत सम्मान था , 
                      
                    विनम्रता और सौम्यता से परिपूर्ण गरिमामयी प्रभावशाली व्यक्तित्व अमिता की अनूठी पहचान थी, उनका जन्म ३० अक्टूबर १९६३ को हुआ था और १८ जनवरी १९८९ को उनका विवाह  हुआ था ,  ,उनकी २ बेटी  हैं , वो अपने खुशहाल परिवार के साथ विजय नगर इंदौर में रहती थी।   

                         क्लास के री-यूनियन फक्शन के लिए उनमें काफी उत्साह था , हम उनके सहयोग से इस दिशा में आगे बढ़ रहे थे .उनका असमायिक निधन हम सब के लिए बेहद दुखद है, उन्होंने गुजराती समाज स्कूल रतलाम  से 11th करने के बाद रतलाम से बी.एस सी. किया था ,फिर इंदौर के गवर्नमेंट गर्ल्स कॉलेज से केमिस्ट्री में M.Sc. किया था ।
                उनके निधन से हमने अपनी एक शानदार सहपाठी को हमेशा के लिए खो दिया है , ग्रुप की ओर से भेजे गए संवेदना सन्देश पर अमिता जी के पति श्री आशुतोष कानूनगो जी ने यह जबाब भेजा था कि  .... ''अमिता के निधन पर आपके द्वारा प्रकट संवेदना के लिए ह्रदय से आभार । अमिता को पत्नी एवं माँ के रूप में खोना मेरे व बच्चों के लिए अपूर्णीय क्षति है।वे अपनी सुनहरी यादों के साथ सदा हमारे बीच रहेंगी।''आशुतोष जी ने बताया कि अमिता जी पिछले ५ वर्षो से कैंसर से पीड़ित थी , पर यह उनकी जिंदादिली और जीवटता थी कि वह किसी को भी इसके बारे में नहीं बताती थी और मुश्किल हालात में भी खुश और सक्रिय रहने की कोशिश करती थी ।वह अंतिम दिनों में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करती रही ,आखिर मौत ने बाज़ी मार ली।
                         मैंने उन्हें स्कूल छोड़ने के ३२ साल बाद फेस बुक के माधयम से खोजा था वह क्लास के री-यूनियन फंक्शन के लिए गर्ल्स क्लासमेट को खोजने में काफी मदद कर रही थी ,मेरी अमिता जी से अंतिम बार करीब ४ माह पहले फ़ोन पर बात हुए थी , काश हमे उनकी सिमटती हुई जिंदगी का रंच मात्र भी अहसास होता, तो हम जल्दी ही सभी मित्रो को एकत्र कर पुनर्मिलन समारोह आयोजित कर लेते , कम से कम मिल ही लेते , मन में एक कशिश रह गई . अमिता ने दुनिया को अलविदा कह दिया है , पर हम सब की यादों में वह सदा अमर रहेगी। परम पिता ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और उनके परिवार को यह असीम दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करे.
अलविदा अमिता..........

                         '' ना पीछे मुड़कर देखों  ना  आवाज़ दो मुझको ,
                            बड़ी मुश्किल से सीखा है मैंने अलविदा कहना। ''



Thursday, 14 August 2014

              
                 शम्मी  कपूर की वो यादें ,वो कसक 
                                                   - अनिल वर्मा 

 
                                               आज के ही दिन १४ अगस्त २०११ को भारतीय फिल्मों के सदाबहार अभिनेता  शम्मी कपूर इस दुनिया को अलविदा कर गए थे . वो मेरे फेवरेट हीरो थे। सदैव से ही अपने हर पसंदीदा व्यक्ति से मिलने की मेरी महत्वाकांक्षा रही है, चाहे वो कितनी भी बड़ी शख्सियत हो । मै बचपन से शम्मी कपूर जी की फिल्मों का दीवाना था , मैंने उनकी हर फिल्म कई कई बार देखी ,पर उनसे मिलने का मेरा ख्याब अधूरा रहा गया , इसे मै अपनी एक बड़ी नाकामयाबी मानता हूँ .

                         अक्सर दीवानगी के आलम में यूँ  होता है कि कईं बार कोई प्रिय इतना करीब लगने लगता है कि ऐसा लगता है कि मानों हम उसे छू सकते है , पर आगे हाथ बढ़ने पर वो दूर और दूर होता जाता है , मेरी यही दास्ताँ  शम्मी कपूर जी के साथ हुई , यह मेरी बदनसीबी ही है कि मै दो  बार उनके एकदम करीब पहुंच कर भी उनसे न मिल सका। करीब १५-१६ साल पहले की बात है , जब शम्मी कपूर जी बहुत ज्यादा बीमार होने से मुंबई के बीच कैंडी हॉस्पिटल मे भर्ती थे , मै रक्षा बंधन पर मौका पाकर मुंबई पहुंच गया था , सब काम छोड़कर मैंने शम्मी जी से मुलाकात का निश्चय किया , हालाकिं उनसे मिलना यूँ सहज न था ,पर मै योजनाबद्ध रूप से शूटबूटेड, आखों पर रंगीन चश्मा लगाकर बेहतरीन तैयार होकर उस अस्पताल में पंहुच गया , जहाँ शम्मी कपूर के भर्ती होने की खबरे अख़बारों की सुर्ख़ियों में छप रही थी ,वहां काफी मजबूत सिक्योरिटी थी और  यहाँ मेरे पास न तो कोई पॉस था ,न कोई एप्रोच , परन्तु पूरे आत्मविश्वास से लबरेज  मै खटाखट सभी सिक्योरिटी बैरियर को सहजता से पार  करते हुए आगे बढ़ता चला गया , वो लोग भी शायद मुझे कोई बड़ी हस्ती समझ रहे थे , अब  मै अस्पताल के 8th फ्लोर पर उस प्राइवेट रूम के सामने था जहाँ शम्मी कपूर भर्ती थे , कांच के दरवाजे से अन्दर बैड पर मेरे फेवरेट हीरो शम्मी कपूर नज़र आ रहे थे , मैंने वहीं   से उन्हें  हाथ जोड़कर अभिवादन किया ,  वो भी हाथ उठकर जबाब दिए , मै उनसे मिलने की कल्पना से बेहद रोमांचित था , इधर सिक्योरिटी गार्ड ने मेरे रौबदार तरीके से जज़ बताने पर गेट भी खोल दिया , पर मेरे दुर्भाग्य से अचानक  वहां शम्मी कपूर जी की  पत्नी राजकुमारी नीला आ गयी , वो बोली कि ' अभी आप शम्मी जी  नहीं मिल सकेंगे , आप उनके ठीक होने पर घर आईयेगा ',  मेरे काफी अनुनय विनय करने पर भी वो देवी ना मानी, आखिर हताश होकर मै वापस लौट गया।  

                                          इस घटना के करीब ५ साल बाद मै फिर मुंबई मे था , इस बार मै सीधा ही उनके मालाबार हिल्स स्थित उनके शानदार बंगले पर चला गया , उनका पी. ए.उनसे मिलाने के लिए मान गया , पर मेरी किस्मत इस बार भी रूठी हुई थी , फिर उनकी पत्नी नीलादेवी के वहां प्रगट जाने से एक बार वहीं कहानी दोहरायी गई , उन्होंने फिर किसी बहाने से मुझे शम्मीजी से मिलने से वंचित कर दिया।

                                  
आज शम्मी जी हमारे बीच नहीं है , उनकी फिल्मो की दिलकश अदाकारी  और  जिंदादिली से परिपूर्ण यादें तो सदा साथ रहेगी , पर उनके पास पहुंच भी मिल ना पाने की वो कसक हमेशा सालती रहेगी। 
                                                                                                                             - अनिल वर्मा

Tuesday, 12 August 2014

                 गुरुदत्त की वो आखिरी रात

                                                                                                                           - अनिल वर्मा 

                                              '' तेरे तअरुफ में ये कौन-सी अजनबीयत
                                                 न तुझे पाकर चैन, न तुझे खोकर चैन। ''



                            महान फिल्म अभिनेता और निर्देशक गुरुदत्त की जिंदगी का इश्क और जुनून आज भी  किसी रहस्य की तरह है. गुरुदत्त को पहले पार्श्व गायिका गीता दत्त से इश्क हुआ जिनसे उनकी शादी भी हुई और दो प्यारे बच्चे भी . फिर वो वहीदा रहमान को भी चाहने लगे.पर  दो नावों में एक साथ सवार होने की इस नाकामयाब कोशिश में गीतदत्त अनायास उनसे दूर हो गईं , वहीदा के लिए गुरुदत्त के मन में अनूठी  कशिश थी .पर 'मुझे जीने दो' के सेट पर जब गुरुदत्त को  वहीदा रहमान से इश्क का अंजाम सुनील दत्त के थप्पड़ से मिला, फिर उस दिन वहाँ से लौटने के बाद तो गुरुदत्त फिर मानों कभी होश में ही नहीं  आए. गुरुदत्त की जिंदगी अगर एक अधूरी कहानी है ,तो उनकी मौत भी एक अफसाना. यह रहस्य आज भी बरकरार है कि ३९ साल के गुरुदत्त  की मौत महज एक दुर्घटना थी या आत्महत्या, वास्तव में उस सच को भी कोई नहीं जानता, जो उनकी आखिरी रात का था.

                                दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग होते हैं , जिन्हें मौत को गले लगाते समय अपनों की करीबी नसीब होती है. हर व्यक्ति यही चाहता है कि जब उसे आए तो उसके अपने उसके साथ हों . जिस रात के काले अंधेरों के आगोश में गुरुदत्त मौत की नींद सो गए थे ,उस रात गुरु दत्त पैडर रोड स्थित किराये के अपने आर्क रॉयल फ्लैट में अकेले थे, उन्होंने जमकर शराब पी थी, इतनी तो उन्होंने पहले कभी नहीं पी थी. गीता के साथ उनकी नोंकझोंक हो गई थी. गीता ने उनकी बिटिया को उनके साथ कुछ वक्त बिताने के लिए भेजने से इंकार कर दिया था. बैचैन गुरुदत्त अपनी पत्नी को बार–बार फोन कर रहे थे कि वह उन्हें अपनी बेटी से मिलने दे ,लेकिन गीता फोन नहीं उठा रही थी।

                                     ९ अक्टूबर १९६४ को रात के १ बजे के आसपास उनसे विदा लेने वाले आख़िरी शख्स थे उनके अजीज दोस्त अबरार अल्वी, जो उनके ड्राइंग-रूम में फिल्म  'बहारें फिर भी आएँगी' का क्लाइमेक्स दृश्य लिख रहे थे ।  विडंबना देखिये,यह माला सिन्हा द्वारा अभिनीत उस चरित्र का मृत्यु दृश्य था जो अकेलेपन,मानसिक तनाव एवं हृदयघात का शिकार होता है ।"मैं अब आराम करना चाहूँगा", गुरुदत्त को अबरार को कहे गए यह अंतिम शब्द थे , जिसके बाद अपने पीछे दृश्य लिखते अबरार को छोड़कर  चले गए  । इसके बाद उन्होंने थोड़ा सा खाना खाया और फिर ढेर सारी नींद की गोलिया भी  ,रात को 12:30 बजे उन्होंने  राजकपूर को फ़ोन किया था। गुरुदत्त ने उस रात बहुतों को फोन किया था आखिरी सांस से ऐन पहले, इसलिए, ताकि कोई उनकी तड़प सुन ले, पर किसी के पास वक्त न था। अपनी ही फिल्म 'प्यासा ' के नायक विजय और ' कागज़ के फूल ' के नायक सुरेश सिन्हा की भांति  उनके मन में कहीं गहरी दबी निराशा उभर आई, अकेलेपन के ऐसे ही क्षणों में उन्‍होंने अपना जीवन खत्‍म कर लिया, संसार छूट गया और यहाँ के सारे गम भी. लेकिन उन्‍हें जानने वाले ये कभी समझ ही न सके कि अकेलेपन और अवसाद का वह कैसा सघनतम क्षण रहा होगा , जब गुरुदत जैसे संवेदनशील कलाकार के लिए दुनिया से मुंह मोड़ लेना ही एक मात्र रास्ता बचा था . शनिवार १०  अक्टूबर१९६४ की सुबह लोगों को  यह दुखद खबर मिली – गुरुदत्त नहीं रहे, वक्त ने उन्हें वक्त से पहले ही इस दुनियां से दूर कर दिया. उन्होंने  फिल्म 'कागज़ के फूल 'में यह  कहा भी था  -

                              '' वक्त ने किया क्या हसीं सितम,तुम रहे ना तुम हम रहे ना हम
                                

                                                                                                                   - अनिल वर्मा 
                                                                    anilverma55555@gmail.com