Thursday, 14 August 2014

              
                 शम्मी  कपूर की वो यादें ,वो कसक 
                                                   - अनिल वर्मा 

 
                                               आज के ही दिन १४ अगस्त २०११ को भारतीय फिल्मों के सदाबहार अभिनेता  शम्मी कपूर इस दुनिया को अलविदा कर गए थे . वो मेरे फेवरेट हीरो थे। सदैव से ही अपने हर पसंदीदा व्यक्ति से मिलने की मेरी महत्वाकांक्षा रही है, चाहे वो कितनी भी बड़ी शख्सियत हो । मै बचपन से शम्मी कपूर जी की फिल्मों का दीवाना था , मैंने उनकी हर फिल्म कई कई बार देखी ,पर उनसे मिलने का मेरा ख्याब अधूरा रहा गया , इसे मै अपनी एक बड़ी नाकामयाबी मानता हूँ .

                         अक्सर दीवानगी के आलम में यूँ  होता है कि कईं बार कोई प्रिय इतना करीब लगने लगता है कि ऐसा लगता है कि मानों हम उसे छू सकते है , पर आगे हाथ बढ़ने पर वो दूर और दूर होता जाता है , मेरी यही दास्ताँ  शम्मी कपूर जी के साथ हुई , यह मेरी बदनसीबी ही है कि मै दो  बार उनके एकदम करीब पहुंच कर भी उनसे न मिल सका। करीब १५-१६ साल पहले की बात है , जब शम्मी कपूर जी बहुत ज्यादा बीमार होने से मुंबई के बीच कैंडी हॉस्पिटल मे भर्ती थे , मै रक्षा बंधन पर मौका पाकर मुंबई पहुंच गया था , सब काम छोड़कर मैंने शम्मी जी से मुलाकात का निश्चय किया , हालाकिं उनसे मिलना यूँ सहज न था ,पर मै योजनाबद्ध रूप से शूटबूटेड, आखों पर रंगीन चश्मा लगाकर बेहतरीन तैयार होकर उस अस्पताल में पंहुच गया , जहाँ शम्मी कपूर के भर्ती होने की खबरे अख़बारों की सुर्ख़ियों में छप रही थी ,वहां काफी मजबूत सिक्योरिटी थी और  यहाँ मेरे पास न तो कोई पॉस था ,न कोई एप्रोच , परन्तु पूरे आत्मविश्वास से लबरेज  मै खटाखट सभी सिक्योरिटी बैरियर को सहजता से पार  करते हुए आगे बढ़ता चला गया , वो लोग भी शायद मुझे कोई बड़ी हस्ती समझ रहे थे , अब  मै अस्पताल के 8th फ्लोर पर उस प्राइवेट रूम के सामने था जहाँ शम्मी कपूर भर्ती थे , कांच के दरवाजे से अन्दर बैड पर मेरे फेवरेट हीरो शम्मी कपूर नज़र आ रहे थे , मैंने वहीं   से उन्हें  हाथ जोड़कर अभिवादन किया ,  वो भी हाथ उठकर जबाब दिए , मै उनसे मिलने की कल्पना से बेहद रोमांचित था , इधर सिक्योरिटी गार्ड ने मेरे रौबदार तरीके से जज़ बताने पर गेट भी खोल दिया , पर मेरे दुर्भाग्य से अचानक  वहां शम्मी कपूर जी की  पत्नी राजकुमारी नीला आ गयी , वो बोली कि ' अभी आप शम्मी जी  नहीं मिल सकेंगे , आप उनके ठीक होने पर घर आईयेगा ',  मेरे काफी अनुनय विनय करने पर भी वो देवी ना मानी, आखिर हताश होकर मै वापस लौट गया।  

                                          इस घटना के करीब ५ साल बाद मै फिर मुंबई मे था , इस बार मै सीधा ही उनके मालाबार हिल्स स्थित उनके शानदार बंगले पर चला गया , उनका पी. ए.उनसे मिलाने के लिए मान गया , पर मेरी किस्मत इस बार भी रूठी हुई थी , फिर उनकी पत्नी नीलादेवी के वहां प्रगट जाने से एक बार वहीं कहानी दोहरायी गई , उन्होंने फिर किसी बहाने से मुझे शम्मीजी से मिलने से वंचित कर दिया।

                                  
आज शम्मी जी हमारे बीच नहीं है , उनकी फिल्मो की दिलकश अदाकारी  और  जिंदादिली से परिपूर्ण यादें तो सदा साथ रहेगी , पर उनके पास पहुंच भी मिल ना पाने की वो कसक हमेशा सालती रहेगी। 
                                                                                                                             - अनिल वर्मा

Tuesday, 12 August 2014

                 गुरुदत्त की वो आखिरी रात

                                                                                                                           - अनिल वर्मा 

                                              '' तेरे तअरुफ में ये कौन-सी अजनबीयत
                                                 न तुझे पाकर चैन, न तुझे खोकर चैन। ''



                            महान फिल्म अभिनेता और निर्देशक गुरुदत्त की जिंदगी का इश्क और जुनून आज भी  किसी रहस्य की तरह है. गुरुदत्त को पहले पार्श्व गायिका गीता दत्त से इश्क हुआ जिनसे उनकी शादी भी हुई और दो प्यारे बच्चे भी . फिर वो वहीदा रहमान को भी चाहने लगे.पर  दो नावों में एक साथ सवार होने की इस नाकामयाब कोशिश में गीतदत्त अनायास उनसे दूर हो गईं , वहीदा के लिए गुरुदत्त के मन में अनूठी  कशिश थी .पर 'मुझे जीने दो' के सेट पर जब गुरुदत्त को  वहीदा रहमान से इश्क का अंजाम सुनील दत्त के थप्पड़ से मिला, फिर उस दिन वहाँ से लौटने के बाद तो गुरुदत्त फिर मानों कभी होश में ही नहीं  आए. गुरुदत्त की जिंदगी अगर एक अधूरी कहानी है ,तो उनकी मौत भी एक अफसाना. यह रहस्य आज भी बरकरार है कि ३९ साल के गुरुदत्त  की मौत महज एक दुर्घटना थी या आत्महत्या, वास्तव में उस सच को भी कोई नहीं जानता, जो उनकी आखिरी रात का था.

                                दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग होते हैं , जिन्हें मौत को गले लगाते समय अपनों की करीबी नसीब होती है. हर व्यक्ति यही चाहता है कि जब उसे आए तो उसके अपने उसके साथ हों . जिस रात के काले अंधेरों के आगोश में गुरुदत्त मौत की नींद सो गए थे ,उस रात गुरु दत्त पैडर रोड स्थित किराये के अपने आर्क रॉयल फ्लैट में अकेले थे, उन्होंने जमकर शराब पी थी, इतनी तो उन्होंने पहले कभी नहीं पी थी. गीता के साथ उनकी नोंकझोंक हो गई थी. गीता ने उनकी बिटिया को उनके साथ कुछ वक्त बिताने के लिए भेजने से इंकार कर दिया था. बैचैन गुरुदत्त अपनी पत्नी को बार–बार फोन कर रहे थे कि वह उन्हें अपनी बेटी से मिलने दे ,लेकिन गीता फोन नहीं उठा रही थी।

                                     ९ अक्टूबर १९६४ को रात के १ बजे के आसपास उनसे विदा लेने वाले आख़िरी शख्स थे उनके अजीज दोस्त अबरार अल्वी, जो उनके ड्राइंग-रूम में फिल्म  'बहारें फिर भी आएँगी' का क्लाइमेक्स दृश्य लिख रहे थे ।  विडंबना देखिये,यह माला सिन्हा द्वारा अभिनीत उस चरित्र का मृत्यु दृश्य था जो अकेलेपन,मानसिक तनाव एवं हृदयघात का शिकार होता है ।"मैं अब आराम करना चाहूँगा", गुरुदत्त को अबरार को कहे गए यह अंतिम शब्द थे , जिसके बाद अपने पीछे दृश्य लिखते अबरार को छोड़कर  चले गए  । इसके बाद उन्होंने थोड़ा सा खाना खाया और फिर ढेर सारी नींद की गोलिया भी  ,रात को 12:30 बजे उन्होंने  राजकपूर को फ़ोन किया था। गुरुदत्त ने उस रात बहुतों को फोन किया था आखिरी सांस से ऐन पहले, इसलिए, ताकि कोई उनकी तड़प सुन ले, पर किसी के पास वक्त न था। अपनी ही फिल्म 'प्यासा ' के नायक विजय और ' कागज़ के फूल ' के नायक सुरेश सिन्हा की भांति  उनके मन में कहीं गहरी दबी निराशा उभर आई, अकेलेपन के ऐसे ही क्षणों में उन्‍होंने अपना जीवन खत्‍म कर लिया, संसार छूट गया और यहाँ के सारे गम भी. लेकिन उन्‍हें जानने वाले ये कभी समझ ही न सके कि अकेलेपन और अवसाद का वह कैसा सघनतम क्षण रहा होगा , जब गुरुदत जैसे संवेदनशील कलाकार के लिए दुनिया से मुंह मोड़ लेना ही एक मात्र रास्ता बचा था . शनिवार १०  अक्टूबर१९६४ की सुबह लोगों को  यह दुखद खबर मिली – गुरुदत्त नहीं रहे, वक्त ने उन्हें वक्त से पहले ही इस दुनियां से दूर कर दिया. उन्होंने  फिल्म 'कागज़ के फूल 'में यह  कहा भी था  -

                              '' वक्त ने किया क्या हसीं सितम,तुम रहे ना तुम हम रहे ना हम
                                

                                                                                                                   - अनिल वर्मा 
                                                                    anilverma55555@gmail.com