Monday, 29 September 2014

शहीद भगत सिंह की बहन बीबी प्रकाश कौर

                    शहीद भगत सिंह की बहन बीबी प्रकाश कौर 
                                                                  - अनिल वर्मा 



                                                         
            

                          
                                                 शेरे हिन्द सरदार भगत सिंह के परिवार को देशभक्ति ,त्याग और बलिदान के अनुपम गुण विरासत में मिले सच्चे मोतियों के समान थे . उनके यशस्वी पिता  किशनसिंह और माता विद्यावती की कुल ९ संतान जगत सिंह , भगत सिंह , बीबी अमर कौर , कुलबीर सिंह , बीबी शकुंतला देवी ,कुलतार सिंह , बीबी प्रकाश कौर , रणवीर सिंह और रजिन्दरसिंह थी , इनमे से जगत सिंह का  तो काफी पहले ही युवावस्था में निधन हो गया  गया था  , फिर इसके बाद   भगत सिंह ने २३ वर्ष की अल्पायु में देश के लिए फांसी के फंदे पर झूलकर शहीद हो गए थे और इससे पूरे देशवासियों  के साथ ही उनके भाई बहिनो में भी देशभक्ति का जो अनूठा जज्बा जाग्रत हुआ था , वह उन सब में आजीवन यथावत कायम रहा .

                                               प्रकाश कौर जी का जन्म पाकिस्तान के लायलपुर जिले में गांव खासडिय़ां में १९१९  में हुआ था , उन्हें घर में लोग सुमित्रा के नाम से जानते थे ,उन्हें अपने प्रिय प्राजी भगत सिंह के साथ रहने और खेलने कूदने का कम ही अवसर मिल सका , भगत सिंह अल्प  आयु में ही क्रांति के पथ पर चल पड़े थे , वह जान बूझकर घर परिवार से दूर रहते थे , ताकि उनके क्रान्तिकारी अभियानों में कोई  बाधा न पहुंचे। २३ मार्च १९३१ को भगत सिंह की शहादत के समय प्रकाश केवल १० वर्ष की थी, पर इस घटना ने उन पर गहरा असर डाला था और वह अपने महान भाई के बलिदान गाथाओं से वह पूरे जीवन भर गौरव अनुभूत  रही ।


                                            बीबी प्रकाश कौर का विवाह राजस्थान के गंगानगर  जिला की पदमपुर तहसील के ५ एन एन  के हरबंश सिंह मलहि के साथ हुआ था , प्रकाश कौर में अपने भाई भगत सिंह के समान अदम्य साहस और संघर्ष का अनूठा ज़ज्बा था , वह ६ फीट ऊंची कदकाठी  की   रौबदार व्यक्तित्व की थीं। १९४७ में देश के बटँवारे की त्रासदी में उन्होंने दंगे रोकने और लोगो के पुनर्वास में अहम दायित्व का निर्वाह किया था।  वर्ष १९६७ में पंजाब विधानसभा के आम चुनावों में उन्होंने भारतीय जनसंघ की टिकट पर कोटकपूरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा है,  तब  अकाली दल के उम्मीदवार हरभगवान सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी मेहर सिंह को हराया था, जबकि प्रकाश कौर करीब पांच हजार मत लेकर तीसरे स्थान पर रही थीं । उस समय भारतीय जनसंघ के सीनियर नेता एडवोकेट श्रीराम गुप्ता की अगुवाई में प्रकाश कौर के समर्थन में जोरदार चुनावी मुहिम चली थी और चुनाव प्रचार में शहीद भगत सिंह की माता समेत परिवार के अन्य सदस्य भी शामिल हुए थे।

             सन १९८० में बीबी प्रकाश कौर अपने पति और दोनों पुत्र रुपिंदरसिंह और हकमत सिंह के साथ कनाडा चली गयी और वहीं बस गयी थी , करीब १९९५ में   उनके पति  का निधन हो गया था जबकि इनकी दो बेटियां गुरजीत कौर व परविंदर कौर होशियारपुर के गांव अंबाला जट्टां के एक ही परिवार में शादीशुदा हैं। गुरजीत कौर अभी गांव में ही हैं व जबकि परविंदर कौर कनाडा में रहती हैं।

                            इस देश की विडम्बना है कि हमने जिन शहीदों और क्रांतिवीरो के अपार त्याग और बलिदान से यह आज़ादी पायी है , उन्हें भुला दिया गया है , उन्हें और उनके वीर परिवारों को सम्मान देना तो दूर रहा , हमारी पाठ्य पुस्तकों में भगत सिंह और आज़ाद जैसे महान क्रांतिकारियों को आतंकवादी लिखा जा रहा है।  यह दुखद और  कटु सत्य है कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह के  एक रिश्तेदार को आतंकवादी करार देकर पुलिस द्वारा फ़र्ज़ी एनकाउंटर में  गोली मारकर हत्या कर दी गयी और उनके परिजन न्याय  के लिए पिछले २५ साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था , तब १९८९ में प्रकाश कौर की बेटी  सुरजीत कौर के दामाद के भाई और ओलंपियन धर्म सिंह के दामाद अम्बाला के जत्तन गांव के रहने वाले कुलजीत  रहस्यमय ढंग से गायब हो गए थे, उन्हें होशियारपर के गरही  गावं से पंजाब पुलिस ने पकड़ा था ,तब से वह लापता है और ऐसा विश्वास है कि पुलिस ने उनकी हत्या कर दी थी।

                    भगत सिंह की वीरांगना बहन  बीबी  प्रकाश कौर इस मामले में लगातार कनाडा से भारत आकर न्याय के संघर्ष में जुटी रही ,उनके द्वारा  सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी रिट याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट को मामला शीघ्र निपटने के दिशा-निर्देश दिए थे और होशियारपुर के सेशन कोर्ट को जल्दी मामले में सुनवाई पूरी करने के लिए कहा है। जिसके बाद से सुरजीत को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है। सुरजीत का परिवार 1989 से ही कुलजीत की रिहाई के लिए प्रयासरत था। बाद में पुलिस ने कहा कि जब कुलजीत को हथियारों की पहचान के लिए ब्यास नदी के नजदीक ले जाया गया था तो वह उसकी गिरफ्त से निकलकर भाग गया था।प्रकाश कौर ने सितंबर 1989 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग गठित किया। आयोग ने अक्टूबर 1993 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में पंजाब पुलिस अधिकारी एस. एस.पी अजीत सिंह संधु (जिसने १९९७ में आत्महत्या कर ली ), डी . एस.पी. जसपाल सिंह ,सार्दुलसिंह , एस.पी.एस. बसरा , सीताराम को प्रथम दृष्टया दोषी  होना इंगित किया गया था और यह कहा गया कि पुलिस की कुलजीत के भागने की कहानी काल्पनिक है। यह दुर्भाग्य है कि बीबी प्रकाश कौर के जीवनकाल में यह मामला अंतिम रूप से निराकृत नहीं हो पाया .
 
                                        बीबी प्रकाश कौर का  ९४ वर्ष की आयु में गत २८ सितम्बर २०१४  को उनके  भाई शहीद-'ए-आजम भगत सिंह के जन्मदिन पर ही  ब्रंटन (टोरंटो ) कनाडा में देहांत हो गया है । उस दिनमृत्यु के पूर्व  परिवार के लोग  उनसे मिले थे ,भगत सिंह की चर्चा किये और उनका आशीर्वाद लिए थे।  वह करीब ६ वर्ष से वह लकवा से पीड़ित थी और बिस्तर पर ही थी । उनके देहांत की जानकारी पंजाब के होशियारपुर में रहने वाले उनके दामाद हरभजन सिंह दत्‍त ने दी। अब भगतसिंह के कोई भी भाई बहन जीवित नहीं बचे है ।   बीबी  प्रकाश कौर ने मृत्यु के चार दिन पहले बुलंद हौंसले के साथ अपनी बेटी गुरजीत कौर से कनाडा में यह कहा था कि जिंदगी में कभी हौंसला मत हारना। प्रकाश कौर तो अपने महान भाई का अनुसरण करते हुए अपना पूरा जीवन बुलंद हौसलों के साथ भरपूर जियी , उन्होंने अपनी राखी हमारी आज़ादी के हवन कुण्ड में समर्पित कर दी थी , पर  हम कृतघ्न देशवासी उन्हें सम्मानपूर्वक श्रद्धांजलि भी नहीं दे सके है , यह उनका नहीं वरन हमारा ही दुर्भाग्य है।  
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    -अनिल वर्मा                     








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Wednesday, 24 September 2014

                                                      अलविदा अलविदा 
                                                   -अनिल वर्मा

                              ' उदास है आसमां के चाँद सितारे , बुझे बुझे है जहाँ के नज़ारे ,
                              हसीं बहारे भी बेपनाह रो रही है ,अलविदा ये महफ़िल कह रही है ''


                          जब अमिता जी के दुनिया से अलविदा हो जाने के बारे में जब  अश्वनी से दुखद खबर मिली , तो सहसा यह विश्वास ही नहीं हुआ कि  हमारे क्लास की आन ,बान और शान अमिता दुबे (कानूनगो ) अब हमारे बीच नहीं रही है . गत २० मई २०१४ को उनका दुःखद निधन हो गया।

                    अमिता जी  हमारे साथ सन १९७७ से १९८० तक क्लास ९ से ११ तक साथ पढ़ी थी , पढ़ाई में वह सर्वोत्तम थी ही , साथ ही वो तीनो साल हमारी क्लास की मॉनिटर रही , निसंदेह वो क्लास की सबसे सम्मानित विद्यार्थी थी , उनका लम्बा कद , चश्मे के साथ मुस्कराहट से खिला उनका खूबसूरत चेहरा,मुझे याद आज भी है। मैंने सन १९८० के बाद उन्हें देखा भी नहीं ,पर वह हमारे स्कूल जीवन की सुनहरी यादों का हिस्सा थी , उनका हर कार्य और आचरण आदर्श रूप में रहता था , वो बहुत ही विनम्र ,मृदुभाषी और शालीन थी , हम लोगो को उन पर गर्व था और सबके मन में उनके लिए बहुत सम्मान था , 
                      
                    विनम्रता और सौम्यता से परिपूर्ण गरिमामयी प्रभावशाली व्यक्तित्व अमिता की अनूठी पहचान थी, उनका जन्म ३० अक्टूबर १९६३ को हुआ था और १८ जनवरी १९८९ को उनका विवाह  हुआ था ,  ,उनकी २ बेटी  हैं , वो अपने खुशहाल परिवार के साथ विजय नगर इंदौर में रहती थी।   

                         क्लास के री-यूनियन फक्शन के लिए उनमें काफी उत्साह था , हम उनके सहयोग से इस दिशा में आगे बढ़ रहे थे .उनका असमायिक निधन हम सब के लिए बेहद दुखद है, उन्होंने गुजराती समाज स्कूल रतलाम  से 11th करने के बाद रतलाम से बी.एस सी. किया था ,फिर इंदौर के गवर्नमेंट गर्ल्स कॉलेज से केमिस्ट्री में M.Sc. किया था ।
                उनके निधन से हमने अपनी एक शानदार सहपाठी को हमेशा के लिए खो दिया है , ग्रुप की ओर से भेजे गए संवेदना सन्देश पर अमिता जी के पति श्री आशुतोष कानूनगो जी ने यह जबाब भेजा था कि  .... ''अमिता के निधन पर आपके द्वारा प्रकट संवेदना के लिए ह्रदय से आभार । अमिता को पत्नी एवं माँ के रूप में खोना मेरे व बच्चों के लिए अपूर्णीय क्षति है।वे अपनी सुनहरी यादों के साथ सदा हमारे बीच रहेंगी।''आशुतोष जी ने बताया कि अमिता जी पिछले ५ वर्षो से कैंसर से पीड़ित थी , पर यह उनकी जिंदादिली और जीवटता थी कि वह किसी को भी इसके बारे में नहीं बताती थी और मुश्किल हालात में भी खुश और सक्रिय रहने की कोशिश करती थी ।वह अंतिम दिनों में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करती रही ,आखिर मौत ने बाज़ी मार ली।
                         मैंने उन्हें स्कूल छोड़ने के ३२ साल बाद फेस बुक के माधयम से खोजा था वह क्लास के री-यूनियन फंक्शन के लिए गर्ल्स क्लासमेट को खोजने में काफी मदद कर रही थी ,मेरी अमिता जी से अंतिम बार करीब ४ माह पहले फ़ोन पर बात हुए थी , काश हमे उनकी सिमटती हुई जिंदगी का रंच मात्र भी अहसास होता, तो हम जल्दी ही सभी मित्रो को एकत्र कर पुनर्मिलन समारोह आयोजित कर लेते , कम से कम मिल ही लेते , मन में एक कशिश रह गई . अमिता ने दुनिया को अलविदा कह दिया है , पर हम सब की यादों में वह सदा अमर रहेगी। परम पिता ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और उनके परिवार को यह असीम दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करे.
अलविदा अमिता..........

                         '' ना पीछे मुड़कर देखों  ना  आवाज़ दो मुझको ,
                            बड़ी मुश्किल से सीखा है मैंने अलविदा कहना। ''