Thursday, 16 October 2014

                                                                        अजीत
                                                         - अनिल वर्मा 
 
                                         प्रख्यात फिल्म अभिनेता अजीत जिन्हें सारी दुनिया लॉयन के नाम से जानती थी, उनकी आवाज शेर की भांति बुलंद थी। वह पांच दशक तक भारतीय फिल्म जगत में अजेय रहे। अजीत के परदे पर आगमन से ही दर्शकों के दिल दहल उठते थे ।खलनायकी के बेताज बादशाह अजीत को कौन नहीं जानता , याद कीजिये फिल्म कालीचरण का वह सीन जिसमे सेठ दीनदयाल ( अजीत)  बड़ी नफ़ाज़त से खून को जमा देने वाली सर्द आवाज़ में इंस्पेक्टर प्रभाकर श्रीवास्तव   (शत्रुधन सिन्हा )से कहते है   ''  डी. एस.पी. साहब , सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है  '' . 

                    अजीत  के रौबदार और प्रभावशाली व्यक्तित्व और उनके लम्बे फ़िल्मी जीवन की सुनहरी दास्ताँ बयां करने के लिए इस फेसबुक  ग्रुप '' Film Actor Ajit '' में आपका स्वागत है। 
                                                                                                              
                                                                                - अनिल वर्मा

Thursday, 9 October 2014

                                           गुरु दत्त की ५० वीं पुण्यतिथि 
                                                                        - अनिल वर्मा

            


 


                 आज से ठीक ५० साल पहले वह रहस्यमय बदनसीब रात थी , जिसने गुरु दत्त को सदैव के लिए हमसे छीन लिया . उनकी मौत महज एक हादसा थी या ख़ुदकुशी ,यह रहस्य १९६४ में जहाँ था  , आज भी वही है , उनकी मौत की अबूझ पहेली शायद कभी सुलझ न सकेगी। 

                             यह कहा जाता है कि  गुरु दत्त ने वहीदा रहमान की बेवफाई के कारण उनका दिल टूट गया था , और वह गहन हताशा में डूब गए थे , पत्नी गीता को वो कभी वापस नहीं पा सकते थे। इसलिए उन्होंने मौत को ही गले लगाना बेहतर था। गुरदत्त के निधन के बाद वहीदा ने एक बयान जारी किया था। जिसमें उन्होंने कहा था  “ऊपरवाले ने उन्हें सबकुछ दिया था लेकिन उन्हें संतोष नहीं था , वह कभी संतुष्ट नहीं होते थे।  शायद इसीलिए जो चीज उन्हें जिंदगी नहीं दे पा रही थी, उसे उन्होंने मौत में तलाशा।  उन्हें पूर्ण संतुष्टी की तलाश थी। कोई तृप्ति, कोई मौत, कोई अंत, कोई पूर्णता वह चाहते थे। मुझे नहीं पता उनकी मौत दुर्घटना थी या घटना, लेकिन इतना जानती हूं, उन्हें कोई नहीं बचा सकता था। उनमें बचने की चाह ही नहीं थी। मैंने उन्हें कई बार समझाने की कोशिश की कि जिंदगी में सब कुछ नहीं मिल सकता और मौत हर सवाल का जवाब नहीं है। मगर वे नहीं माने। मैं जानती हूं वो मौत से मोहब्बत करते थे, बेपनाह मोहब्बत, इसलिए उन्होंने इसे गले लगा लिया।”

                      इस दुनिया से जाने वाले कभी लौट कर वापस नहीं आते ,बस उनकी यादें शेष रह जाती है। गुरुदत्त जी सिनेमा के रुपहले परदे पर और हम सब प्रशंसकों के दिलो में हमेशा अमर रहेंगे .हम सब की ओर से महानायक गुरु दत्त को आँसूओं से धुँधली हो रही नज़रों और भरे हुई  कंठ के साथ उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित है।
                                                                                                                            - अनिल वर्मा